भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३२८ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

यह घृत मन्दाग्निवालोंको अत्यन्त हितकारी एवं ग्रहणी, विष्टम्भ, आमदोष' दुर्बलता, प्लीहा, खाँसी, श्वास, क्षय, बवासीर, भगन्दर, कफजन्यरोग, वातज रोग और कृमिरोग इन सबको तत्काल इस प्रकार नष्ट करदेता है जैसे दावाग्नि सूखे काष्ठको तत्क्षण भस्म करदेता है ॥ १३ ॥ १४ ॥

महाषट्पलकघृत ।

सौवर्चलं पञ्चकोलं सैन्धवं हबुषा विडम् ।
अजमोदा यवक्षारं हिङ्गु जीरकमौद्भिदम् ॥ १५ ॥
कृष्णाजाजीं सभूतीकं कल्कीकृत्य पलार्द्धकम् ।
आर्द्रकस्य रसं चुकं क्षीरमस्त्वम्लकाञ्जिकम् ॥ १६ ॥
दशमूलकषायेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
भक्तेन सह पातव्यं निर्भक्तं वा विचक्षणैः ॥ १७ ॥
कृमिप्लीहोदराजीर्णज्वरकुष्ठप्रवाहिकाम् ।
वातरोगान् कफव्याधीन् हन्याच्छूलमरोचकम् ॥ १८ ॥
पाण्डुरोगं क्षयं कासं दौर्बल्यं ग्रहणीगदम् ।
महाषट्पलकं नाम वृक्षमन्द्राशनिर्यथा ॥ १९ ॥

कालानमक, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, सेंधानमक, हाऊबेर, बिरे-यासंचरनमक, अजमोद, जवाखार, हींग, जीरा, समुद्रलवण, काला जीरा और अजवायन इनका कल्क दो दो तोले, एवं अदरखका रस, चुकेका स्वरस, दूध, दहीके तोड, काँजी, दशमूलका क्वाथ और घी ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ लेवे सबको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । इस घृतको भातके साथ अथवा बिनाही भातके सेवन करे तो यह महाषट्पलक नामक घृत कृमिरोग, तिल्ली, उदररोग, अजीर्ण, ज्वर, कुष्ठ, प्रवाहिका, वातरोग, कफरोग, शूल, अरुचि, पाण्डुरोग, क्षय, खाँसी, दुर्बलता, संग्रहणी प्रभृति रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है; जैसे वज्र वृक्षोंको तत्काल नाश करदेता है ॥ १५–१९ ॥

बिल्वतैल ।

तुलार्धं शुष्कबिल्वस्य तुलार्द्धं दशमूलतः ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं चतुर्भागावशेषितम् ॥ २० ॥
आर्द्रकस्य रसप्रस्थमारनालं तथैव च ।
तैलप्रस्थं समादाय क्षीरप्रस्थं तथैव च ॥ २१ ॥