भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३३४ | भैषज्यरत्नावली । | [अर्शोरोग- |
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यद्वायोरनुलोम्याय यदग्निबलवृद्धये ।
अनुपानौषधद्रव्यं तत्सेव्यं नित्यमर्शसैः ॥ २ ॥
जो औषधियाँ और अनुपान वायुको अनुलोमन करनेवाले और अग्निके बलकी वृद्धि करनेवाले हैं, अर्शके रोगियोंको वे सब नित्य सेवन करने चाहिये ॥ २ ॥
शुष्कार्शसां प्रलेपादिक्रिया तीक्ष्णा विधीयते ।
स्राविणां रक्तमालोक्य क्रिया कार्याऽस्रपैत्तिकी ॥ ३ ॥
शुष्क अर्शोरोगवाले मनुष्योंको प्रलेपादि तीक्ष्ण क्रिया करनी चाहिये और रुधिर-स्राव होनेवाले अर्शरोगियोंको रक्तपित्तरोगके समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३ ॥
स्नुक्क्षीरं रजनीयुक्तं लेपाद् दुर्नामनाशनम् ।
कोषातकीरजोघर्षान्निपतन्ति गुदोद्भवाः ॥ ४ ॥
थूहरके दूध और हल्दीके चूर्णको एकत्र मिलाकर लेप करनेसे अथवा तोरईका चूर्णको मलनेसे अर्शके अंकुर गिरपडते हैं ॥ ४ ॥
असितानां तिलानां प्राक् प्रकुञ्चं शीतवार्यनु ।
खादतोऽर्शांसि नश्यन्ति द्विजदार्थ्याङ्गपुष्टिदम् ॥ ५ ॥
काले तिलोंके चार तोले परिमाण चूर्णको शीतल जलके साथ खानेसे अर्शोरोग नष्ट होता है । दाँत दृढ और शरीर पुष्ट होता है ॥ ५ ॥
कफजे शृङ्गवेरस्य क्वाथो नित्योपयोगिकः ॥ ६ ॥
कफकी बवासीरमें प्रतिदिन सोंठका क्वाथ सेवन करना हितकारी है ॥ ६ ॥
अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं तिक्ततुम्ब्याश्च पल्लवाः ।
करञ्जो बस्तमूत्रं च लेपनं श्रेष्ठमर्शसाम् ॥ ७ ॥
आकका दूध, थूहरका दूध, कडुवीतोरईके पत्ते, दुर्गन्ध करंज और बकरेका मूत्र इनको एकत्र मिलाकर लेप करना अर्शोरोगवालोंके लिये हितकर है ॥ ७ ॥
अर्शोघ्नी गुदजा वर्त्तिर्गुडघोषाफलोद्भवा ।
ज्योतिष्मकामूलकल्केन लेपो रक्तार्शसां हितः ॥ ८ ॥
गुड और तोरईके फूलोंके चूर्णको एकत्र मिलाकर बत्ती बनावे । उसको गुदामें रखनेसे बवासीर दूर होती है और मालकांगुनीकी जडके कल्कका लेप करना रक्तार्शवाले रोगियोंको उपयोगी है ॥ ८ ॥
तुम्बीबीजं सोद्भिदं तु काञ्जिपिष्टं गुडीत्रयम् ।
अर्शोहरं गुदस्थं स्याद्दधि माहिषमश्नतः ॥ ९ ॥