भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 372
३४०भैषज्यरत्नावली ।[अर्शोरोग-

विजयचूर्ण ।

त्रिकत्रयवचाहिंगु पाठाक्षारनिशाद्वयम् ।
चव्यतिक्ताकलिङ्गाभ्रिशताह्वालवणानि च ॥ ३८ ॥
ग्रन्थिबिल्वाजमोदा च गणोऽष्टाविंशतिर्मतः ।
एतानि समभागानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ३९ ॥
ततो बिडालपदकं पिबेदुष्णेन वारिणा ।
एरण्डतैलयुक्तं तु सदा लिह्यात् ततो नरः ॥ ४० ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, दालचीनी, इलायची, तेजपात, वच, हींग, पाठ, जवाखार, हल्दी, दारूहल्दी, चव्य, कुटकी, इन्द्रजौ, चीता, सौंफ, पाँचों नमक, पीपलामूल, बेलगिरी और अजमोद इन अट्ठाईस औषधियोंको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे फिर इसमेंसे प्रतिदिन एक तोला चूर्णको मन्दोष्ण जलके साथ अथवा अण्डीके तेलके साथ सेवन करे ॥ ३८-४० ॥

कासं हन्यात् तथा शोथमर्शांसि च भगन्दरम् ।
हृच्छूलं पार्श्वशूलं च वातगुल्मं तथोदरम् ॥ ४१ ॥
हिक्काश्वासप्रमेहांश्च कामलां पाण्डुरोगताम् ।
आमाशयमुदावर्त्तमन्त्रवृद्धिं गुदं कृमीन् ॥ ४२ ॥
अन्ये च ग्रहणीदोषा ये मया परिकीर्तिताः ।
महाज्वरोपसृष्टानां भूतोपहतचेतसाम् ॥ ४३ ॥
अप्रजानां तु नारीणां प्रजावर्द्धनमेव च ।
विजयो नाम चूर्णोऽयं कृष्णात्रेयेण पूजितः ॥ ४४ ॥

यह विजयनामवाला चूर्ण खाँसी, सूजन, बवासीर, भगन्दर, हृदयका शूल, फसलीका शूल, वातगुल्म, उदररोग, हिचकी, श्वास, प्रमेह, कामला, पाण्डुरोग, आमाशयके रोग, उदावर्त्त, अन्त्रवृद्धि, गुदाके विकार, कृमिरोग, संग्रहणी आदि जो अन्यान्य रोग मैंने कहे हैं उन सबको नष्ट करता है एवं महाज्वर और भूतबाधाको दूर करता है तथा वन्ध्या स्त्रियोंको सन्तानके देनेवाला यह चूर्ण कृष्णात्रेय ऋषि करके पूजित है ॥ ४१-४४ ॥

शूरणपिण्डी ।

चूर्णीकृताः षोडश शूरणस्य भागास्ततोऽर्द्धेन च चित्रकस्य ।
महौषधाब्दौ मरिचस्य चैको गुडेन दुर्नामजयाय पिण्डी ॥
“पिण्डयां गुडो मोदकवत् पिण्डत्वापत्तिकारकः” ॥ ४५ ॥

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित) · पृष्ठ 372, कुल 1416 में से · BharatKosha