भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३४७
नेसे सर्वप्रकारके ज्वर, बिजौरे नींबूके रसके साथ देनेसे समस्त शूलरोग एवं कैथ और तेन्दूके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके विषोंको तत्काल नष्ट करती है। एवं गोबरके रसके साथ सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कुष्ठरोग और निसोतके क्वाथके साथ सेवन करनेसे जलोदररोगको दूर करती है। भोजनके पश्चात् इसको भक्षण करनेसे अरुचि दूर होकर रुचि उत्पन्न होती है। सर्वप्रकारके नेत्ररोगोंमें शहदके साथ घिसकर आँखोंमें आँजनेसे शीघ्र लाभ होता है। यह वटी शहदमें मिलाकर चाटनेसे स्त्रियोंके प्रदररोगको तत्काल नष्ट करती है। जो पुरुष न्यायालय, जुआ, संग्राम और शिकार खेलनेके समय इस वटीको लेकर जाता है, वह शीघ्रही विजय पाता है ॥ ७७-८२ ॥
कुटजलेह।
कुटजत्वक्पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
अष्टभागावशिष्टं तु कषायमवतारयेत् ॥ ८३ ॥
वस्त्रपूतं पुनः क्वाथं पचेल्लेहत्वमागतम् ।
भल्लातकं विडङ्गानि त्रिकटु त्रिफला तथा ॥ ८४ ॥
रसाञ्जनं चित्रकं च कुटजस्य फलानि च ।
वचामतिविषां बिल्वं प्रत्येकं च पलं पलम् ॥ ८५ ॥
गुडात् पलानि त्रिंशच्च चूर्णीकृत्य विनिक्षिपेत् ।
मधुनः कुडवं दद्याद् घृतस्य कुडवं तथा ॥ ८६ ॥
कुडेकी जडकी छालको सौ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पककर आठवाँ भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छान लेवे। फिर उस क्वाथको दुबारा पकावे। जब पकते २ लेहकी समान गाढा होजाय तब नीचे उतारकर उसमें शुद्ध भिलावे, वायविडङ्ग, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, रसौंत, चीतेकी जड, इन्द्रजौ, वच, अतीस, बेलगिरी इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले एवं गुड ३० पल, शहद १६ तोले और घी १६ तोले डालकर सबको एकमएक कर देवे ॥ ८३-८६ ॥
एष लेहः शमयति चार्शो रक्तसमुद्भवम् ।
वातिकं पैत्तिकं चापि श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् ॥८७॥
ये च दुर्नामजा रोगास्तान् सर्वान्नाशयत्यपि ।
अम्लपित्तमतीसारं पाण्डुरोगमरोचकम् ॥ ८८ ॥