भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३४९
रक्तका अतिसार, शूल, सर्व प्रकारके रुधिरके विकार और ऊर्ध्व व अधः इन दोनों मागोंसे बहनेवाले बलवान् रक्त-पित्तको शीघ्र नष्ट करती है ॥ ९०-९४ ॥
दशमूल-गुड़ ।
दशमूलाग्निदन्तीनां प्रत्येकं पलपञ्चकम् ।
जलद्रोणेन संक्वाथ्य पादशेषे समुद्धरेत् ॥ ९५ ॥
गुडं पलशतं चैव सिद्धे शीते विमिश्रयेत् ।
त्रिवृताया रजः प्रस्थस्तदद्धं पिप्पलीरजः ॥ ९६ ॥
घृतभाण्डे स्थितं खादेत् कर्षमात्रं दिनेदिने ।
दशमूलगुडः ख्यातः शमयेद्रोगमार्शसम् ॥
अजीर्णं पाण्डुरोगं च सर्वरोगहरं परम् ॥ ८७ ॥
दशमूलकी सब औषधियाँ, चीतेकी जड और दन्तीकी जड प्रत्येक औषध २०-२० तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे फिर उसमें १०० पल गुड डालकर दूसरी बार पकावे उत्तम प्रकारसे पाक होजानेपर नीचे उतारलेवे शीतल होनेपर उसमें निसोतका चूर्ण १ प्रस्थ और पीपलका चूर्ण आधा प्रस्थ मिलाकर घीके चिकने बासनमें भरकर रखदेवे । इसमेंसे प्रतिदिन एक एक कर्ष प्रमाण सेवन करे तो यह दशमूलनामवाला गुड सर्व प्रकारकी बवासीर, अजीर्ण, पाण्डुरोग एवं अन्यान्य सम्पूर्ण रोगोंको दूर करता है ॥ ९५-९७ ॥
बाहुशाल गुड ।
त्रिवृत्तेजोवती दन्ती श्वदंष्ट्रा चित्रकं शठी ।
गवाक्षी मुस्तबिल्वाह्वविडङ्गानि हरीतकी ॥ ९८ ॥
पलोन्मितानि चैतानि पलान्यष्टावरुष्करात् ।
षट्पलं वृद्धदारस्य शूरणस्य तु षोडश ॥ ९९ ॥
जलद्रोणद्वये क्वाथं चतुर्भागावशेषितम् ।
पूतं तु तं रसं भूयः क्वाथयेत्त्रिगुणो गुडः ॥ १०० ॥
लेहं पचेत्तु तं तावद् यावद्दर्वीप्रलेपनम् ।
अवतार्य ततः पश्चाच्चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ १ ॥