भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३७८ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-

हींग १ भाग, वच २ भाग, पीपल ३ भाग, सोंठ, ४ भाग, अजवायन ५ भाग, हरड, ६ भाग, चीतेकी जड, ७ भाग और कूट ८ भाग लेकर सबको एकत्र बारीक पीस लेवे । यह स्वल्पाग्निमुख चूर्ण सुरामण्ड, दहीका पानी, मदिरा अथवा गरम-जल इनमेंसे किसी एक अनुपानके साथ पान करतेही वायुको हरता है तथा उदावर्त्त, अजीर्ण, प्लीहा, उदररोग, अर्श, शूल, गुल्म, खाँसी, श्वास और क्षय इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं अग्निको दीपन करता है । जिसके अङ्ग शिथिल होगये हों या जिसने विष खा लिया हो उनके लिये भी यह चूर्ण हितकर है । यह अग्निमुखनामक चूर्ण कहीं भी विफल नहीं होता है ॥

बृहदग्निमुखचूर्ण ।

द्वौ क्षारौ चित्रकं पाठा करञ्जं लवणानि च ।
सूक्ष्मैलापत्रकं भार्गी कृमिघ्नं हिङ्गु पुष्करम् ॥ १५ ॥
शठी दार्बी त्रिवृन्मुस्तं वचा चेन्द्रयवस्तथा ।
धात्री जीरकवृक्षाम्लं श्रेयसी चोपकुञ्चिका ॥ १६ ॥
अम्लवेतसमम्लीका यमानी सुरदारु च ।
अभयाऽतिविषा श्यामा हबुषाऽऽरग्वधं समम् ॥ १७ ॥
तिलमुष्ककशिग्रूणां कोकिलाक्षपलाशयोः ।
क्षाराणि लौहकिट्टं च तप्तं गोमूत्रसेचितम् ॥ १८ ॥
समभागानि सर्वाणि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ।
मातुलुङ्गरसेनैव भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ १९ ॥
दिनत्रयं तु शुक्तेन आर्द्रकस्य रसेन च ।
अत्यग्निकारकं चूर्णं प्रदीप्ताग्निसमप्रभम् ॥ २० ॥

जवाखार, सज्जी, चीतेकी जड, पाठ, करंज, पाँचों नमक, छोटी इलायची, तेजपात, भारगी, वायविडङ्ग, हींग, पुहकरमूल, कचूर, दारुहल्दी, निसोत, नागरमोथा, वच, इन्द्रजौ, आमला, जीरा, विषांबिल ( तिन्तडीक ), गजपीपल, कालाजीरा, अम्लवेत, इमली, अजवायन, देवदारु, हरड, अतीस, अनन्तमूल, हाऊबेर, अमलतास, तिलोंका क्षार, रोवेका क्षार, सहिंजनेका क्षार, तालमखानेका क्षार, ढाकका क्षार और गोमूत्रमें सिद्ध कियाहुआ लोहकी मण्डूर इन सबको समान भाग लेकर पीसकर एकत्र बारीक चूर्ण कर लेवे । फिर इस चूर्णको बिजौरानींबुके रसमें तथा तीन दिन शुक्तनामक काँजी और तीन दिन