भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । [ ३८९
नींबूके रसमें २१ बार भावना देकर छोटे बेरकी समान गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें एक एक गोली खानी चाहिये । और ऊपरसे वातादि दोषोंको देखकर तदनुसार अनुपान सेवन करना चाहिये । यह अग्निसन्दीपनामक रस पृथ्वीमें परमदुर्लभ है । यह मन्दाग्निको तत्क्षण दीपन करता है एवं अजीर्ण, अम्लपित्त, शूल और गुल्मरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ७४-८० ॥
त्रिफलालौह ।
त्रिफलामुस्तवेलैश्च सितया कणया समम् ।
खरमञ्जरीबीजैश्च लौहं भस्मकनाशनम् ॥ ८१ ॥
त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, मिश्री, पीपल और चिरचिटेके बीज इन समस्त औषधियोंका चूर्ण समान भाग और सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर लोहभस्म मिलाकर दो दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करे तो यह लोह भस्मक रोगको दूर करता है ॥ ८१ ॥
प्रदीपनरस ।
रसनिष्कं गन्धनिष्कं निष्कमात्रं प्रदीपनम् ।
मानमर्द्धं प्रदातव्यं चुल्लिकालवणं भिषक् ॥ ८२ ॥
मर्दयित्वा प्रदातव्यमथास्य माषमात्रकम् ।
अजीर्णे चाग्निमान्द्ये च दातव्यो रसवल्लभः ॥ ८३ ॥
शुद्ध पारा ४ माशे, शुद्ध गन्धक ४ मासे, शुद्ध मीठा तेलिया ४ मासे और चुल्लिका-लवण २ मासे इनको एकत्र खरल करके अजीर्ण और मन्दाग्नि रोगमें एक एक मासेकी मात्रासे सेवन करावे ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
विजयरस ।
रसस्यैकं पलं दत्त्वा नागं च गन्धकं पलम् ।
क्षारत्रयं पलं देयं लवणं पलपञ्चकम् ॥ ८४ ॥
दशमूलीजयाचूर्णं तद्द्रवेण तु भावयेत् ।
चित्रकस्य रसेनाथ भृङ्गराजरसेन तु ॥ ८५ ॥
१ “ अत्र नागशब्देन विषं ग्राह्यम् ” ॥