भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 426
३९४भैषज्यरत्नावली।[ अग्निमान्द्य-

टङ्कणं सूततुल्यं तु चाम्लयोगेन मर्दयेत् ।
भोजनान्ते प्रयोक्तव्या गुञ्जाफलप्रमाणतः ॥ १०९ ॥
शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग और शुद्ध मीठा तेलिया ६ भाग इन सबको एकत्र कर चीतेके क्वाथमें भावना देवे । फिर उसमें धतूरेके बीजोंकी भस्म ३२ भाग त्रिकुटा ३ भाग, लौंग ३ भाग, इलायची ३ भाग, जायफल और जावित्री प्रत्येक डेढ डेढ भाग तथा पाँचों नमक, थूहर, आक, अण्ड, इमली, चिरचिटा, पीपल इनका क्षार दो भाग और हरड, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा और सुहागा य प्रत्येक एक एक भाग मिलाकर काँजी आदि अम्लपदार्थोंके रसमें खरल करे इनका प्रतिदिन एकएक रत्तीकी मात्रासे भोजनके पश्चात् सेवन करे ॥ १०५–१०९ ॥

रसः पाशुपतो नाम सद्यः प्रत्ययकारकः ।
दीपनः पाचनो हृद्यः सद्यो हन्ति विषूचिकाम् ॥ ११० ॥
तालमूलीरसेनैव उदरामयनाशनः ।
मोचारसेनातिसारं ग्रहणीं तक्रसैन्धवैः ॥ १११ ॥
सौवर्चलकणाशुण्ठीयुतः शूलं विनाशयेत् ।
अर्शो हन्ति च तक्रेण पिप्पल्या राजयक्ष्मकम् ॥ ११२ ॥
वातरोगं निहन्त्याशु शुण्ठीसौवर्चलान्वितः ।
शर्कराधान्ययोगेन पित्तरोगं निहन्त्ययम् ॥ ११३ ॥
पिप्पलीक्षौद्रयोगेन श्लेष्मरोगं च तत्क्षणात् ।
अतः परतरो नास्ति धन्वन्तरिमतो रसः ॥ ११४ ॥
यह पाशुपतनामवाला रस तत्काल अग्निको दीपन करनेवाला, पाचक, हृदयको हितकारी और विषूचिका रोगको शीघ्र नष्ट करता है । मुसलीके क्वाथके साथ इस रसको सेवन करनेसे उदररोग दूर होते हैं । मोचरसके साथ देनेसे अतिसार, मट्ठे और सैंधानमकके साथ देनेसे संग्रहणी एवं कालानमक पीपल और सोंठ इनके समान भाग चूर्णके साथ इस रसको देनेसे शूलरोग दूर होता है । यह रस तक्रके साथ बवासीर, पीपलके साथ राजयक्ष्मा, सोंठ और कालेनमकके साथ सेवन करनेसे वातरोगको नष्ट करता है । एवं मिश्री और धनियेके साथ सेवन करनेसे पित्तके रोग और पीपल तथा शहदके साथ सेवन करनेसे कफके रोगोंको तत्क्षण दूर करता है ! इससे बढकर अन्य औषध नहीं है ऐसा धन्वन्तरि महाराजने कहा है ॥ ११०-११४ ॥