भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९६ भैषज्यरत्नावली । [ अग्निमान्द्य-
अर्द्धयामेन तत् सर्वं भस्मीभवति निश्चितम् ।
चतुर्विधरसोपेतं महाभोजनमिच्छतः ॥ २४ ॥
भोजस्य नृपतेः कांक्षां भोजनात्कृपया कृतः ।
गहनानन्दनाथेन सर्वलोकहितैषिणा ॥ २५ ॥
यह रस बहुत कालसे नष्टहुई जठराग्निको अत्यन्त दीपन करता है । एवं आमवात, प्लीहा, पाण्डुरोग, प्रमेह, अफारा, मलविवन्ध, प्रसूतरोग, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, प्रतिश्याय, राजयक्ष्मा, क्षय, अम्लपित्त, शूल, भगन्दर, बवासीर, ८ प्रकारके उदररोग और दारुण यकृत् इन सब रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । जो कण्ठपर्यन्त भोजन करके इस रसको खावे तो खायाहुआ सब भोजन अर्द्धप्रहरमें ही निश्चय भस्म होजाता है । भोज्य, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य इन चारों प्रकारके रसोंसे युक्त भोजनोंमें राजा भोजकी अधिक इच्छा होनेसे और संपूर्ण मनुष्योंके हितकी इच्छासे श्रीगहनानन्दनाथजीने कृपा करके इस रसको निर्माण किया है ॥ १२०-२५ ॥
शङ्खवटी ।
चिञ्चाक्षारपलं पटुव्रजपलं निम्बूरसे कल्कितं
तस्मिन् शंखपलं प्रतप्तमसकृत् संस्थाप्य शीर्णावधि ।
हिङ्ग्व्योषपलं रसामृतवलीन् निक्षिप्य निष्कांशिकान्
बद्धा शंखवटी क्षयग्रहणिकारुक्पंक्तिशूलादिषु ॥ २६ ॥
[ पटु-लवणं पञ्चलवणं मिलित्वा पलं हिङ्गुशुण्ठी-
पिप्पलीमरिचानामपि मिलित्वा पलं, रसविषगन्ध-
कानां प्रत्येकं निष्कं माषचतुष्टयं शंखं गड्ड्यां वह्नौ
ध्मात्वा निम्बुरसतप्तां निक्षिपेत् यावच्चूर्णीभूय तद्रसे
पतति सर्वं चूर्णमेकीकृत्य निम्बूरसेन रौद्रे तावद्
भावयेद्यावदम्लता भवति ]
इमलीका क्षार ४ तोले, पाँचोंनमक ४ तोले और शंखभस्म ४ तोले लेवे । उसमें शंखभस्म ४ तोले लेकर नींबूके रसमें न मिलने लगे तबतक अग्निमें तपाकर नींबूके रसमें बुझाता रहे । फिर सबचूर्णको एकत्र करके नीम्बूके रसमें धूपमें तबतक भावना देवे कि जबतक उसमें अम्लता ( खटाई ) न आजाय । हींग, सोंठ, पीपल और मिरच ये समान भाग मिश्रित ४ तोले