भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०१


द्रुत तच्चालयेत् प्राज्ञः प्रस्तरे भाजने शुभे ।
दद्याद्रक्तिद्वयं वारि वारिदस्वरसादिभिः ।
अग्निमान्द्यमजीर्णं च शूलानाहोदरामयान् ॥ ५१ ॥
अम्लपित्तं तथाऽऽध्मानं विष्टम्भं गुल्ममेव च ।
वज्रक्षारो निहन्त्याशु शक्रवज्रो यथा तरुम् ॥ ५२ ॥

सज्जी चार मासे, कालानमक चार मासे और शुद्ध जवाखार २ तोले इनको लोहेके बर्त्तनमें रखकर मन्द मन्द अग्निसे गलाकर पत्थरके बर्त्तनमें डालकर पर्पटी तैयार करलेवे। इनको दो दो रत्तीकी मात्रासे शीतलजल अथवा नागरमोथेके स्वरसके साथ सेवन करनेसे यह वज्रक्षार अग्निमान्द्य, अजीर्ण, शूल, आनाह, उदर-रोग, अम्लपित्त, अफारा, विबन्ध, गुल्मप्रभृति विविधप्रकारके रोगोंको नष्ट करता है ॥ १५०-५२ ॥

क्रव्यादरस ।

पलं रसस्य द्विपलं बलेः स्याच्छुल्बायसी चार्द्धपलप्रमाणे ।
विचूर्ण्य सर्वं द्रुतवह्नियोगादेरण्डपत्रेऽथ निवेशनीयम् ॥ ५३ ॥
कृत्वाऽथ तां पर्पटिकां विदध्याल्लौहस्य पात्रे वरपूतमा मन् ।
जम्बीरजं पक्वरसं पलानि शतं नियोज्याग्निमथल्पमल्पम् ॥
जीर्णे रसे भावितमेतदेतैः सुपञ्चकोलोद्भववारिपूरैः ।
सेवेत साम्लैः शतमत्र देयं समं रजष्टङ्कणजं सुभृष्टम् ॥५५॥
विडं तदर्द्धं मरिचं समं च तत्सप्तधाऽऽर्द्रं चणकाम्लकेन ।
क्रव्यादनामा भवति प्रसिद्धो रसस्तु मन्थानकभैरवोक्तः ॥५६॥

शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले, ताम्रभस्म २ तोले और लोहभस्म २ तोले इन सबको एकत्र चूर्ण करके लोहेकी कडाहीमें डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब अच्छे प्रकारसे पाक होजाय तब अण्डके पत्तेपर लोटकर उसकी पर्पटी बनालेवे । फिर उस पर्पटीको जम्बीरीनींबूके १०० पल रसमें धीरे धीरे पकावे । जब सब रस सूखजाय तब पञ्चकोलके क्वाथ सौ पल और अम्लवेतके सौपल क्वाथको पृथक् पृथक् डालकर भावना देवे । पश्चात् सुहागेकी खील १६ तोले, विरियासंचर नमक ८ तोले और कालीमिरचोंका चूर्ण ४० तोले मिलाकर भीगे हुए चनोंके खारके पानीमें सातबार भावना देवे तो यह मन्थानक भैरवका कहा हुआ क्रव्यादनामवाला प्रसिद्ध रस सिद्ध होता है ॥ ५३–५६ ॥

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