भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४०३
शुद्ध अभ्रकभस्म ४ तोले, चव्य ४ तोले एवं चीता, सिह्लारू, धतूरा, बल और अदरखका रस ३ तोले, एवं पीपलामूल, सौंफ, कदम्ब और आककी जड इन प्रत्येकका क्वाथ चारचार तोले लेवे । सबको पृथक् २ खरलमें डालकर मर्दन करे । फिर उसमें एक कर्ष सुहागा मिलाकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसें प्रतिदिन एकएक गोली फरहदके रसके साथ सेवन करे तो यह रस मन्दाग्नि, बहुत पुराना गुल्म, शूल, अम्लपित्त, ज्वर, वमन, दुष्ट मसूरिका, अलसक, श्वास, खाँसी तृषा, प्लीहा, यकृत्, क्षय, स्वरभंग, कुष्ठ, अरुचि, दाह, मोह, समस्त दोषोत्पन्न मूत्रकृच्छ्र, बवासीर, आमवात और नेत्ररोग इन सबको समूल नष्ट करदेता है । इस विश्वोदीपकनामवाले अभ्रकको सर्व प्रकारके रोगोंको हरनेके लिये पूर्वकालमें शिवजीने कहा है । यह समस्त रोगियोंके लिये हितकारी और सम्पूर्ण रोगोंका नाश करनेवालाहै । अतिसारकोभी पचादेता है तथा बलकारक, अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, उत्तम रसायन एवं बुद्धि और शरीरकी कान्तिको बढाता है ॥ १५९-१६१ ॥
वीरभद्राभ्रक ।
अभ्रकं पुटसहस्रमारितं कर्षयुग्ममतिनिर्मलीकृतम् ।
वासराणि नवतिं विमर्दितं चित्रकस्वरससाधुसिक्तकम् ॥ ६२ ॥
शृङ्गवेररसमर्दिता वटी कारिता सकलरोगनाशिनी ।
भक्षिता भुजगवल्लिपत्रकैः शृङ्गवेरशकलेन वा पुनः ॥ ६३ ॥
वह्निमान्द्यमभिनाश्य सत्वरं कारयेत् प्रखरपावकोत्करम् ।
श्वासकासवमिशोथकामलाप्लीहगुल्मजठरारुचिभ्रमान् ॥ ६४ ॥
रक्तपित्तयकृदम्लपित्तकं शूलकोष्ठजगदान् विषूचिकाम् ।
आमवातमथ वातशोणितं दाहशीतबलह्रासकार्श्यकम्॥ ६५ ॥
विद्रधिं ज्वरगदं शिरोगदं नेत्ररोगमखिलं हलीमकम् ।
हन्ति वृष्टयममेतदभ्रकं वीरभद्रमतिबल्यमुत्तमम् ॥
भक्षितं विविधभक्ष्यमानलं काष्ठसङ्घमिव भस्मतां नयेत् ६६
उत्तम सहस्रपुटित अभ्रकको दो कर्ष लेकर चीतेके रसमें ९० दिनतक उत्तम प्रकारसे खरल करे । फिर अदरखके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह वटी सर्वप्रकारके रोगोंको नाश करनेवाली है । इस वटीको पानके साथ अथवा अदरखके टुकडोंके साथ सेवन करनेसे मन्दाग्नि, श्वास, खाँसी आदि