भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१५
पलाशबीजेन्द्रविडङ्गनिम्बभूनिम्बचूर्णं सगुडं लिहेद्यः। दिनत्रयेण क्रिमयःपतन्ति पलाशबीजेन यमानिकां वा ॥११॥
ढाकके बीज, इन्द्रजौ, वायविडङ्ग, नीमकी छाल और चिरायता इन सबके चूर्णको समान भाग लेकर गुडमें मिलाकर सेवन करनेसे अथवा ढाकके बीज और अजवायनको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कृमि तीन दिनमें नष्ट होकर गिरजाते हैं ॥ ११ ॥
पेषयेदारनालेन नाडीचस्य फलानि च। यूकालिख्याःप्रशान्त्यर्थं दद्याल्लेपं तु मस्तके ॥ १२ ॥
जुओं और लीखोंको नष्ट करनेके लिये नाडीके शाकके फलोंको काँजीके साथ पीसकर सिरपर लेप करे ॥ १२ ॥
रसेन्द्रेण समायुक्तो रसो धुत्तूरपत्रजः। ताम्बूलपत्रजो वापि लेपाद्युकाविनाशनः ॥ १३ ॥
पारेको धतूरेके पत्तोंके रस अथवा पानके रसमें खरल करके मस्तकपर लेप करनेसे शिरकी सब जुयें नष्ट होजाती हैं ॥ १३ ॥
आखुकर्णीदलैः पिष्टैः पिष्टकेन च पूपिकाम्। जग्ध्वा सौवीरकं चानु पिबेत्कृमिहरं परम् ॥ १४ ॥
मूसाकानीके पत्तोंके रससे जौ अथवा चावलोंके चूर्णको मलकर पूए बनाकर खाय और ऊपरसे काँजी पीवे तो कृमिरोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥
सुरसादिगणं वापि सर्वथैवोपयोजयेत् । विडङ्गसैन्धवक्षारकम्पिल्लकहरीतकीः ॥ पिबेत्तक्रेण सम्पिष्य सर्वक्रिमीन्निवृत्तये ॥ १५ ॥
सुरसादिगणकी औषधियोंका कल्क वा क्वाथ सेवन करनेसे अथवा वायविडङ्ग सैंधानमक, जवाखार, कबीला और हरड इन सब औषधि समान भाग लेकर और सबका एकत्र चूर्ण करके मट्ठेके साथ सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कृमि नष्ट होते हैं १५
पारसीयादिचूर्ण।
पार्सीयायमानिका च घनकणशृङ्गीविडङ्गारुणा- चूर्णं श्लक्ष्णतरं विलीढमपि तत्क्षौद्रेण संयोजितम् । कासं नाशयति ज्वरं च जयति प्रौढातिसारं जये- च्छर्दिं मर्दयति क्रिमिं तु नियतं कोष्ठस्थमुन्मूलयेत् ॥१६॥