भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १५
क्रोधप्रवातभोज्यानि वर्जयेत्तरुणज्वरी ।
शोषच्छर्द्दिमदं मूर्च्छा-भ्रमतृष्णाऽरोचकान् ॥
प्राप्नोत्युपद्रवानेतान् परिषेकादिसेवनात् ॥ ८० ॥
नवीन ज्वरवाला रोगी दो वार भोजन न करे । अर्थात् प्रातःकाल और रात्रिको भोजन न करे । एवं कफकारक और गुरुपाकी पदार्थोंका भोजन भी नहीं करे । शरीरपर जलका सेचन, चन्दनादिका प्रलेप, तैलादिकी मालिश, स्नान, संशोधन ( वमन, विरेचनादि ), दिनमें सोना, स्त्रीसंसर्ग, परिश्रम, शीतल जलपान, क्रोध, वायुका सेवन और अन्नादिका भोजन नवीन ज्वरमें त्यागदेवे । इनका परित्याग न करनेसे मुखशोष, वमन, मद, मूर्च्छा, भ्रम, तृष्णा और अरुचि आदि अनेक उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ७८-८० ॥
ज्वरे लंघनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् ।
क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ ८१ ॥
धातुक्षय, यक्ष्मारोग, निरामवायु, भय, क्रोध, काम, शोक और परिश्रम इन कारणोंको छोड़कर और किसी भी कारणसे ज्वर होनेपर पहले उपवास करना चाहिये ॥ ८१ ॥
आमाशयस्थो हत्वाऽग्निं सामो मार्गान् पिधापयेत् ।
विदधाति ज्वरं दोषस्तस्माल्लंघनमाचरेत् ॥ ८२ ॥
अनवस्थितदोषाग्नेर्लंघनं दोषपाचनम् ।
ज्वरघ्नं दीपनं कांक्षारुचिलाघवकारकम् ॥ ८३ ॥
प्राणाविरोधिना चैनं लंघनेनोपपादयेत् ।
बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ ८४ ॥
तन्नु मारुतक्षुत्तृष्णामुखशोषभ्रमान्विते ।
कार्य्यं न बाले नो वृद्धे न गर्भिण्यां न दुर्बले ॥ ८५ ॥
सामदोष ( अपक्व रसयुक्त वात, पित्त, कफ ) आमाशयमें स्थित होकर पहले अग्निको मन्द करते हैं । फिर पसीनेको बहानेवाले और रस बहानेवाले और स्रोतोंको बन्द करके ज्वर उत्पन्न करते हैं । इसलिये ज्वरकी प्रथम अवस्थामें लंघन कराने चाहिये । सामदोषोंसे अग्नि मन्द होकर ज्वर होनेपर लंघन करानेसे सामदोषोंका परिपाक, ज्वरका नाश, अग्निकी वृद्धि, भोजनकी इच्छा, भोजनमें रुचि और शरीरमें