भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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४५२ भैषज्यरत्नावली । [ रक्तपित्त-

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सोनामाखीकी भस्म, लोहभस्म इन सबको समान भाग लेकर त्रिफलेके क्वाथमें एकदिनतक खरल करके एक घडियामें रखकर भूधरयन्त्रमें पकावे । जब पककर शीतल होजाय तब औषधि निकालकर खरल करलेवे । इसको प्रतिदिन रात्रिके समय एक एक रत्तीकी मात्रासे त्रिफलेके क्वाथके साथ सेवन करावे और ऊपरसे लोहेके पात्रमें गायका दूध औटाकर पान करावे । यह रस रक्तपित्तको नष्ट करनेके लिये अत्युत्तम है ॥ ५२ ॥

कपर्दकरस ।

मृतं वा मूर्च्छितं सूतं कार्पासकुसुमद्रवैः ।
मर्दयेद्दिनमेकं तु तेन पूर्य्या वराटिका ॥ ५३ ॥
निरुध्य चान्धमूषायां भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पचेत् ।
उद्धृत्य चूर्णयेत् श्लक्ष्णं मरिचैर्द्विगुणैः सह ॥ ५४ ॥
गुञ्जामात्त्रं घृतेनैव भक्षयेत्प्रातरुत्थितः ।
उदुम्बरं घृतं चैव अनुपानं प्रयोजयेत् ॥
कपर्दकरसो नाम रक्तपित्तविनाशनः ॥ ५५ ॥

रससिन्दूर अथवा शुद्ध कियेहुए पारेको कपासके फूलोंके रसमें एक दिनतक खरल करके कौडीमें भरलेवे फिर उस कौडीको अन्धमूषानामक यन्त्रमें रखकर और उस यन्त्रको मिट्टीके पात्रमें बन्द करके पुटपाक करे । जब वह उत्तम प्रकारसे पककर अपने आप शीतल होजाय तब औषधि निकालकर उसमें दुगुना काली मिरचोंका चूर्ण मिलाकर लेवे । इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक रत्ती प्रमाण घृतके साथ मिलाकर सेवन करे । अनुपान—गूलरका रस और घृत । यह कपर्दक-नामक रस रक्तपित्तनाशक है ॥ ५३–५५ ॥

समशर्कर लौह ।

लौहाच्चतुर्गुणं क्षीरमाज्यं द्विगुणमुत्तमम् ।
चूर्णं पादं तु वैडङ्गं दद्यान्मधुसिते समे ॥ ५६ ॥
ताम्रपात्रे शुभे पक्त्वा स्थापयेद् घृतभाजने ।
माषकादिक्रमेणैव भक्षयेद्विधिपूर्वकम् ॥ ५७ ॥
अनुपानं प्रयुञ्जीत नारिकेलजलादिकम् ।
रक्तपित्तं जयेत्तीव्रमम्लपित्तं क्षतक्षयम् ॥
पुष्टिदं कान्तिजननमायुष्यं वृष्यमुत्तमम्॥ ५८ ॥