भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 1416 में से

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४५७

कासं श्वासं क्षयं हिक्कां रक्तपित्तं हलीमकम् ।
हृद्रोगमम्लपित्तं च पीनसं च व्यपोहति ॥ ८४ ॥
एक उत्तम पकाहुआ पेठा लेकर और उसको छीलकर तथा बीज निकालकर कुछ उबालकर सुखालेवे । ऐसे पेठेके टुकड़ोंको ५० पल लेकर और उनको पीसकर एक प्रस्थ घृतमें उत्तम प्रकारसे भूनलेवे । फिर उसको अडूसेके २५६ तोले क्वाथमें ४०० तोले खाँडके साथ धीरे धीरे पकावे । जब पाक यथाविधि सिद्ध होजाय तब उसमें नागरमोथा, आमले, वंशलोचन, भारंगी, दारचीनी, तेजपात और छोटी इलायची ये प्रत्येक एक एक कर्ष, एलुआ, सोंठ, धनियाँ और कालीमिरच ये प्रत्येक एक एक तोला और पीपल १६ तोले इन सबको बारीक पीसकर डालेदेवे और शीतल होजानेपर ३२ तोले शहद डालकर करछीसे सबको एकमएक करके घीके चिकने बर्तनमें भरकर रखदेवे । इस वासाकूष्माण्डखण्डको प्रतिदिन छः छः मासे प्रमाण सेवन करनेसे खाँसी, श्वास, क्षय, हिचकी, रक्तपित्त, हलीमक, हृदयरोग, अम्लपित्त और पीनस ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ८१-८४ ॥

वासाखण्ड ।
तुलामादाय वासायाः पचेदष्टगुणे जले ।
तेन पादावशेषेण पाचयेदाढकं भिषक् ॥ ८५ ॥
चूर्णानामभयानां च खण्डाच्छुद्धाच्छतं तथा ।
द्विपलं पिप्पलीचूर्णात्सिद्धे शीते च माक्षिकात् ॥ ८६ ॥
कुडवं पलमानं तु चातुर्जातं च चूर्णितम् ।
क्षिप्त्वा विलोडितं खादेद्रक्तपित्ती क्षतक्षयी ॥
कासश्वासपरीतश्च यक्ष्मणा च प्रपीडितः ॥ ८७ ॥
अडूसेको १०० पल लेकर अठगुने जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । उस क्वाथमें सौ पल शुद्ध खाँड डालकर पकावे । जब अच्छे प्रकारसे चासनी होजाय तब उसमें हरडोंका चूर्ण २५६ तोले और पीपलका चूर्ण ८ तोले डालकर अग्निसे नीचे उतार लेवे । शीतल होजानेपर दारचीनी, छोटी इलायची, तेजपात और नागकेशर इनका चूर्ण ४ तोले एवं शहद ३२ तोले डालकर करछीसे सबको मिलादेवे ) इस औषधिको छः छः मासेकी मात्रासे प्रतिदिन सेवन करनेसे रक्तपित्त, उरःक्षत, खाँसी, श्वास और यक्ष्मारोगसे पीडित रोगी आरोग्यलाभ करता है । ८५-८७ ॥

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