भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७० | भैषज्यरत्नावली | [ यक्ष्मरोग-
पीपल, दाख और मिश्री इन तीनोंको समान भाग लेकर शहद और तिलके साथ अथवा असगन्ध, पीपल और मिश्री इनको शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे क्षयरोग नष्ट होता है ॥ १३ ॥
यष्ट्याह्नं चन्दनोपेतं सम्यक् क्षीरप्रपेषितम् ।
क्षीरेणालोड्य पातव्यं रुधिरच्छर्दिनाशनम् ॥ १४ ॥
मुलहठी और चन्दन, दोनोंको समान भाग लेकर और दूधमें बारीक पीसकर और दूधमें घोलकर पान करनेसे रुधिरकी वमन दूर होती है ॥ १४ ॥
छागमांसं पयश्छागं छागं सर्पिः सशर्करम् ।
छागोपसेवा शयनं छागमध्ये तु यक्ष्मनुत् ॥ १५ ॥
बकरीका मांस खाना, बकरीका दूध पीना, बकरीके घृतको मिश्रीमें मिलाकर सेवन करना, बकरियोंकी सेवा करना और बकरियोंके बीचमें सोना इन उपायोंके द्वारा यक्ष्मरोग नष्ट होता है ॥ १५ ॥
दशमूलक्वाथ !
दशमूलबलारास्ना पुष्करसुरदारुनागरैः कथितम् ।
पेयं पार्श्वांसशिरोरुक्क्षयकासादिशान्तये सलिलम् ॥ १६॥
दशमूलकी समस्त औषधियाँ, खिरेंटी, रास्ना, पोहकरमूल, देवदारु और सोंठ इनका यथाविधि क्वाथ बनाकर पीनेसे क्षय, कास, पार्श्वशूल कन्धोंकी पीडा और शिरःशूलादि रोग शमन होते हैं ॥ १६ ॥
अश्वगन्धादिक्वाथ ।
अश्वगन्धामृताभीरुदशमूलीबलावृषाः ।
पुष्करातिविषे घ्नन्ति क्षयं क्षीररसाशिनः ॥ १७ ॥
असगन्ध, गिलोय, शतावर, दशमूल, खिरेंटी, अडूसा, पोहकरमूल और अतीस इनका क्वाथ बनाकर पान करे और दूध तथा मांसरसका भोजन करे तो क्षयरोग नष्ट होता है ॥ १७ ॥
त्रयोदशाङ्गक्वाथ ।
धन्याकपिप्पलीविश्वदशमूलीजलं पिबेत् ।
पार्श्वशूलज्वरश्वासपीनसादिविवृत्तये ॥ १८ ॥
धनियाँ, पीपल, सोंठ और दशमूल इनके क्वाथको पान करनेसे क्षयरोगीकें पार्श्वशूल, ज्वर, श्वास, पीनस आदि विकार दूर होते हैं ॥ १८ ॥