भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७८ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग -
इसको उचित मात्रासे सेवन करनेसे उरःक्षत, कण्ठगतरोग, अत्यन्त भयंकर राज- यक्ष्मा, बाहुस्तम्भ और अर्दितादिरोग नष्ट होते हैं ॥ ६२ ॥ ६३ ॥
मधुताप्यविडङ्गाश्मजतुलोहघृताभयाः । हन्ति यक्ष्माणमत्युग्रं सेव्यमानो हिताशिनः ॥ ६४ ॥
स्वर्णमाक्षिक, वायविडंग, शिलाजीत और हरड इन ओषधियोंको एक एक भाग और सबकी बराबर लोहभस्म लेकर एकत्र खरल करलेवे । इस यक्ष्मारि लोहको घी और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे और पथ्य पदार्थोंको सेवन करनेसे अत्यन्त उग्र यक्ष्मारोग दूर होता है ॥ ६४ ॥
यक्ष्मान्तकलौह ।
रास्नातालीशकर्पूरभेकपर्णीशिलाह्वयैः । त्रिकत्रयसमायुक्तैर्लोहो यक्ष्मान्तको मतः ॥ ६५ ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तमपि वैद्यविवर्जितम् । हन्ति कासं स्वराघातं क्षयकासं क्षतक्षयम् । बलवर्णाग्निपुष्टीनां साधनं दोषनाशनम् ॥ ६६ ॥
रास्ना, तालीशपत्र, कपूर, मण्डूकपर्णी, शिलाजीत, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग, नागरमोथा और चीतेकी जडकी छाल प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला और लोह भस्म चौदह तोले लेवे सबको एकत्र जलके द्वारा खरल करके गोलियाँ बनालेवे । यह यक्ष्मान्तकलोह है । इसीको रास्नादि लौह भी कहते हैं । यह लोह-खाँसी, स्वरभंग, क्षयकी खाँसी, क्षतक्षय एवं सम्पूर्ण उपद्रवोंसे युक्त और वैद्योंसे त्यागे हुये राजयक्ष्मारोग और अन्यान्य समस्त दोषोंको नष्ट करता है बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि तथा पुष्टि करता है ॥ ६५ ॥ ६६ ॥
शिलाजत्वादि लौह ।
शिलाजतुमधुव्योषताप्यलौहरजांसि च । क्षीरेण लेहितस्याशु क्षयं क्षयमवाप्नुयात् ॥ ६७ ॥
शिलाजीत, मुलहठी, सोंठ, मिरच, पीपल और सोनामाखी-ये प्रत्येक एक एक तोला और लोह भस्म ६ तोले लेकर सबको एकत्र जलके साथ खरल करके गोलियाँ बनालेवे । इस लोहको दूधके साथ सेवन करनेसे क्षयरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ६७ ॥