भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 522
४९०भैषज्यरत्नावली ।[ यक्ष्मरोग-

पूर्या वराटिका तेन टङ्कणेन निरुध्य च ।
भाण्डे चूर्णप्रलिप्तेऽथ क्षिप्त्वा रुद्ध्वा च मृन्मये ॥ ३४ ॥
शोषयित्वा गजपुटे पुटेत्तु चापराह्निके ।
स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य चूर्णयित्वा तु विन्यसेत् ॥ ३५ ॥

रससिन्दूर ४ तोले, सुवर्णभस्म १ तोला और शुद्ध गन्धक ८ तोले इनको एकत्र चीतेके काथके द्वारा खरल करके एक कौडीमें भरकर सुहागेसे उसका मुँह बन्द करदेवे । फिर एक मिट्टिके पात्रमें चुनेका प्रलेप करके उसमें उक्त कौडीको रखकर मिट्टीसे उस पात्रका मुँह बन्दकरके धूपमें सुखाकर अपराह्नके समय गजपुटमें पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर स्वाङ्गशीतल होजाय तब औषधि निकालकर चूर्ण करके शीशीमें भरकर रखदेवे ॥ ३३–३५ ॥

एष लोकेश्वरो नाम वीर्य्यपुष्टिविवर्द्धनः ।
गुञ्जाचतुष्टय चास्य पिप्पलीमधुसंयुतम् ॥ ३६ ॥
भक्षयेत्पयसा भक्त्या लोकेशः सर्वदर्शनः ।
अङ्गकाश्येऽग्निमान्द्ये च कासे पित्ते क्षयेऽपि च ॥ ३७ ॥
मरिचैर्घृतयुक्तैश्च भक्षयेद्दिवसत्रयम् ।
लवण वर्जयेत्तत्र साज्यं दधि च योजयेत् ॥ ३८ ॥
एकविंशद्दिनं यावत्सघृतं मरिचं पिबेत् ।
पथ्यं मृगाङ्कवद्देय शयीतोत्तानपादतः ॥ ३९ ॥

यह लोकेश्वरपोट्टलीनामक रस अत्यन्त वीर्य्यवर्द्धक और पुष्टिकारक है । इसको चार चार रत्ती प्रमाण लेकर पीपलके चूर्ण और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे और दूधके साथ भोजन करे । यह सर्वप्रियरस है, इसको शरीरकी कृशता, मन्दाग्नि, खाँसी, दुष्टपित्त और क्षयादि रोगोंके होनेपर कालीमिरच और घीके साथ मिलाकर ३ दिनतक सेवन करे । इसपर नमक त्यागकर घृतयुक्त दहीका भोजन करना चाहिये और २१ दिनतक मिरचोंके चूर्णको घृतमें मिलाकर सेवन करना चाहिये । इस रसको सेवन करते समय मृगाङ्करसकी समान पथ्य पदार्थोंको देना चाहिये और रोगीको ऊपरको पैर उठाकर शयन करना चाहिये ॥ ३६–३९ ॥

ये शुष्का विषमाशनैः क्षयरुजा याप्याश्च येऽष्ठीलया
ये पाण्डुत्वहताः कुवैद्यविधिना ये शोषिणो दुर्भगाः ।