भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 524
४९२भैषज्यरत्नावली ।[ यक्ष्मरोग-

टङ्कणं रविदुग्धेन मुखं लिप्त्वा निरोधयेत्
मृद्भाण्डे तां निरुध्याथ सम्यग्गजपुटे पचेत् ॥ ४६ ॥
आदाय चूर्णयेत्सर्वं निर्गुण्ड्या सप्त भावनाः ।
आर्द्रकस्य रसैः सप्त चित्रकस्यैकविंशतिः ॥ ४७ ॥
द्रवैर्भाव्यं ततः शोष्याद्—

शुद्ध पारा, हीरा, सोना, चाँदी, शीशा, लोहा, ताँबा, मोती, सोनामाखी, प्रवाल, शङ्ख और तूतिया इन सबकी भस्मोंको समान भाग लेकर एकत्र सात दिनतक अदरखके रसके द्वारा खरल करे। फिर उसको कौडीमें भरकर आकके दूधके द्वारा खरल किये हुए सुहागेसे उस कौडीका मुँह बन्द करदेवे और एक मिट्टीके पात्रमें उसको यथाविधि बन्द करके उत्तम प्रकारसे गजपुटमें पकावे, जब पककर स्वांग-शीतल होजाय तब औषध निकालकर चूर्ण करलेवे । फिर निर्गुण्डीके रसमें सात-बार, अदरखके रसकी सातवार और चीतेके रसकी २१ बार भावना देकर धूपमें सुखालेवे ॥ ४४-४७ ॥

—देयं गुंजाचतुष्टयम् ।
यक्ष्मरोगं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः ॥ ४८ ॥
योजयेत्पिप्पलीक्षौद्रैः सघृतैर्मरिचैस्तथा ।
महारोगाष्टके कासे ज्वरे श्वासेऽतिसारके ॥
पोट्टलीरत्नगर्भोऽयं योगवाहेन योजयेत् ॥ ४९ ॥
( “ वातव्याध्यश्मरीकुष्ठमेहोदरभगन्दराः ।
अर्शांसि ग्रहणीत्यष्टौ महारोगाः प्रकीर्त्तिताः” ) ॥१५०॥

यह रस- चार चार रत्ती प्रमाण लेकर पीपलके चूर्ण और शहदके साथ अथवा मिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ मिलाकर नियमपूर्वक सेवन करनेसे साध्य वा असाध्य सर्व प्रकारके राजयक्ष्मारोगको निस्सन्देह शीघ्र नष्ट करता है। एवं आठ प्रकारके महारोग (वातव्याधि, पथरी, कोढ, प्रमेह, उदररोग, भगन्दर बवासीर और संग्रहणी ) इनमें और खाँसी, श्वास, ज्वर, अतिसारादिरोगोंमें इस रत्नगर्भपोट्टलीनामक रसको यथादोषानुसार अनुपानोँके साथ सेवन करनेसे शीघ्र आरोग्य लाभ होता है॥४८-१५०॥

कनकसुन्दररस ।

रसस्य तुर्यभागेन हेमभस्म प्रयोजयेत् ।
मनःशिला गन्धकं च तुत्थं माक्षिकतालकम् ॥ ५१ ॥