भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४९६ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग ]
इलायची, अजमोद, आमले, हरड, बहेडा, खैर, नीम, विजयसार, सालका सार, बायविडंग, भिलावे, चीता, त्रिकुटा, नागरमोथा और गोपीचन्दन ये प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर चौगुने जलमें पकावे । जब पककर चतुर्थांश जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें एक प्रस्थ घी डालकर पकावे । जब वह उत्तम प्रकारसे पकजाय तब अग्निसे नीचे उतारकर उसमें मिश्री १२० तोले, वंशलोचन २४ तोले और शहद दो प्रस्थ डालकर सबको अच्छे प्रकार मिलाकर शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे । इसको प्रतिदिन प्रातःकाल चार चार तोले सेवन करे और ऊपरसे यथाशक्ति दुग्ध पान करे ॥ ७१-७३ ॥
एतद्धि मेध्यं परमं पवित्रं चक्षुष्यमायुष्यतमं तथैव । यक्ष्माणमाशु व्यपहन्ति शूलं पाण्ड्वामयञ्चापि भगन्दरं च ॥ न चात्र किञ्चित्परिवर्जनीयं रसायनञ्चैतदुपासनीयम् ॥ ७४ ॥ " अत्र चतुर्गुणक्वाथेन कल्कमिदं पाच्यम् " ॥
यह एलादिमन्थ-अत्यन्त पवित्र, मेधाजनक, नेत्रोंको हितकारी, अत्यन्त आयु-वर्द्धक एवं राजयक्ष्मा, शूल, पाण्डुरोग और भगन्दर इन सब व्याधियोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है । इसपर किसी प्रकारका भी परहेज नहीं करना चाहिये । यह रसायन औषध सभीके सेवन करने योग्य है ॥ ७४ ॥
पिप्पलीघृत ।
पिप्पलीगुडसंसिद्धं छागक्षीरयुतं घृतम् । एतदग्निप्रवृद्ध्यर्थं सर्पिश्च क्षयकासिनाम् ॥ ७५ ॥
पीपलका चूर्ण, पुराना गुड और बकरीका दूध इनके साथ यथाविधि घृतको सिद्ध करे । यह घृत क्षय और खाँसीरोगवाले मनुष्योंकी जठराग्निको बढानेके लिये सेवन कराना चाहिये ॥ ७५ ॥
निर्गुण्डीघृत ।
समूलफलपत्राया निर्गुण्ड्याः स्वरसैर्घृतम् । सिद्धं पीत्वा क्षतक्षीणी निर्व्याधिर्भाति देववत् ॥ ७६ ॥
मूल, फल और पत्तोंसहित सिह्वालूके स्वरसके साथ विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करके पान करनेसे क्षतक्षीणरोगी आरोग्य होकर देवके समान होता है ॥ ७६ ॥