भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५१७


तदर्द्धं बालवृद्धेषु पथ्यं देयं यथोचितम् ।
पञ्च कासान्क्षयं श्वासं राजयक्ष्माणमेव च ॥ ५९॥
सन्निपातं कण्ठरोगमभिन्यासमचेतनम् ।
महाकालेश्वरो हन्ति कालनाथेन भाषितः ॥ ६० ॥

लोहभस्म, वङ्गभस्म, ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सोनामाखी, सिंगरक, शुद्ध मीठा तेलिया, जायफल, लौंग, दालचीनी, छोटी इलायची, नागकेशर, धतूरेके बीज और शोधित जमालगोटा इन सब ओषधियोंको समान भाग और मिरच ३ भाग लेकर सबको खरलमें एकत्रित करके लोहेके डण्डेसे घोटे, फिर भाँगके रसकी २१ बार भावना देकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करे । किन्तु बालक और वृद्धको आधी आधी रत्तीकी मात्रासे सेवन करानी चाहिये और दोषानुसार पथ्य देना चाहिये । यह महाकालेश्वररस पाँच प्रकारकी खाँसी, क्षय, श्वास, राजयक्ष्मा, सन्निपातज्वर, कण्ठरोग, अभिन्यासज्वर और मूर्च्छादि रोगोंको नाश करता है। इसको कालनाथने कहा है ॥ ५५-६० ॥

विजयभैरवरस ।

सूतकं गन्धकं लौहं विषमभ्रकतालकम् ।
विडङ्गं रेणुकं मुस्तमेलाग्रन्थिककेशरम् ॥ ६१ ॥
त्रिकटु त्रिफला चित्रं शुद्धं जैपालबीजकम् ।
एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ ६२ ॥
तिन्तिडीबीजमानेन प्रातःकाले तु भक्षयेत् ।
कासं श्वासं क्षयं गुल्मं प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ६३ ॥
अजीर्णे ग्रहणीरोगं हन्ति पाण्ड्वामयं तथा ।
अरुचावतिसारे च सूतिकातङ्कपीडिते ॥ ६४ ॥
अपाने हृदये शूले वातरोगे गलग्रहे ।
ब्रह्मणा निर्मितो ह्येष रसो विजयभैरवः ॥ ६५ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, विष, अभ्रकभस्म, हरताल, वायविडङ्ग, रेणुका, नागरमोथा, छोटी इलायची, पीपलामूल, नागकेशर, सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, चीतेकी जड और शोधित जमालगोटेके बीज इन सब ओषधियोंको समान