भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २३


प्राग्भक्तसेवितमथौषधमेतदेव
दद्याच्च वृद्धशिशुभीरुवराङ्गनाभ्यः ॥ २३ ॥
औषधशेषे भुक्तं तथौषधं सशेषेऽन्ने ।
न करोति गदोपशमं प्रकोपयत्यन्यरोगांश्च ॥ २४ ॥

अन्नहीन (अर्थात् खालीपेट सेवन की हुई) औषध अधिक वीर्यवाली होती है वह रोगको शीघ्रही नष्ट करती है । किन्तु बालक, वृद्ध, स्त्री और कोमल प्रकृति-वाले मनुष्योंको बिना भोजन (अर्थात् खाली पेट) सेवन करनेसे उनके शरीरमें ग्लानि होती है और बलका क्षय होता है । इसलिये इन सबको भोजनसे कुछ समय पहले औषध सेवन करानी चाहिये । कारण, वह औषध आहारसे ढकजानेके कारण मुखसे बारबार नहीं निकलती, बलकी हानि भी नहीं करती और शीघ्र पचजाती है । औषधके न पचनेपर आहार करनेसे अथवा भोजनके बिना पचे औषध सेवन करनेसे औषध रोगको नष्ट नहीं करती, किन्तु अन्यान्य रोगोंको उत्पन्न करदेती है ॥ २३-२४ ॥

जीर्णाजीर्ण-औषधिके लक्षण ।

अनुलोमोऽनिलः स्वास्थ्यं क्षुत्तृष्णा सुमनस्कता ।
लघुत्वमिन्द्रियोद्गारशुद्धिर्जीर्णौषधाकृतिः ॥ २५ ॥
क्लमो दाहोऽङ्गसदनं भ्रमो मूर्च्छा शिरोरुजा ।
अरतिर्बलहानिश्च सावशेषौषधाकृतिः ॥ २६ ॥

औषधके उत्तमप्रकारसे परिपक्व होजानेपर ये लक्षण होते हैं—वायुकी अनुलो-मता (अर्थात् वायुका अपने मार्गमें स्वाभाविक रूपसे गमन करना) शरीरका स्वस्थ होना, क्षुधा और तृषाका लगना, मनमें प्रसन्नता इन्द्रियोंमें हल्कापन और डकारका शुद्ध आना । और औषधिके न पचनेपर शरीरमें ग्लानि, दाह, शिथि-लता, भ्रम, मूर्च्छा, शिरमें पीडा, मनमें खेद, अस्वस्थता और बलका क्षय होता है ॥ २५ ॥ २६ ॥

मात्राका निरूपण ।

मात्राया नास्त्यवस्थानं दोषमग्निं बलं वयः ।
व्याधिं द्रव्यं च कोष्ठं च वीक्ष्य मात्रां प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥