भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 551

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५१९


संहारभैरव रसको संसारकी रक्षाके लिये श्रीगहननाथजीने बडे यत्नसे निर्माण किया है। इसको सेवन करनेपर अडूसा सोंठ और कटेरीका क्वाथ पान कराना चाहिये। यह-विविध प्रकारकी खाँसी, अत्युग्र श्वास और अरुचिको दूर करता है। एवं बल वर्ण कान्तिकी वृद्धि करनेवाला, पुष्टिदायक, जठराग्निको दीपन करनेवाला है ॥ ६९-७१ ॥

बृहद्रसेन्द्रगुटिका ।

कर्षं शुद्धरसेन्द्रस्य गन्धकस्याभ्रकस्य च ।
ताम्रस्य हरितालस्य लौहस्य च विषस्य च ॥ ७२ ॥
मनःशिलायाः क्षाराणां बीजं धुस्तूरकस्य च ।
मरिचस्य च सर्वेषां समं चूर्णं प्रकल्पयेत् ॥ ७३ ॥
जयन्ती चित्रकं मानं घण्टकर्णोल्लमण्डुकी ।
शक्राशनं भृङ्गराजं केशराजार्द्रकं तथा ॥ ७४ ॥
सिन्धुवारस्य च रसैः कर्षमात्रैर्विभावयेत् ।
कलायपरिमाणां तु गुटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ७५ ॥

शोधित पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, शुद्ध हरताल, लोहभस्म, शुद्ध विष, शुद्ध मैनसिल, जवाखार, सज्जी, सुहागा, धतूरेके बीज और मिरच इन सबको एक एक कर्ष लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर जयन्ती, चीता, मानकन्द, घण्टाकर्ण, जिमीकन्द, ब्राह्मी, भाँग, भाँगरा, केशराज ( भाँगरेका भेद ), अदरख और सिह्वालूके पत्ते प्रत्येकके एक एक कर्ष रसके साथ पृथक् पृथक् खरल करके मटरकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ७२-७५ ॥

आर्द्रकस्य रसेनैव पंचकास व्यपोहति ।
हन्ति कासं तथा श्वासं यक्ष्माणं सभगन्दरम् ॥ ७६ ॥
अग्निमान्द्यारुचिं शोथमुदरं पाण्डुकामलाम् ।
रसायनी च वृष्या च बलवर्णप्रदायिनी ॥ ७७ ॥

इसकी एक एक गोली प्रतिदिन अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे यह गुटिका पाँचों प्रकारकी खाँसी, श्वास, यक्ष्मा, भगन्दर, अग्निमान्द्य, अरुचि, शोथ, उदररोग पाण्डु, कामला आदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करती है और यह गुटिका रसायन, वीर्यवर्द्धक और बल तथा वर्णको प्रदान करनेवाली है ॥ ७६-७७ ॥