भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५२३
श्रीचन्द्रामृतलौह ।
त्रिकटु त्रिफला धान्यं चव्यं जीरकंसैन्धवम् ।
दिव्यौषधिहृतस्यापि तत्तुल्यमयसो रजः ॥ १०० ॥
नवगुंजाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ।
प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम् ॥ १०१ ॥
एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसाप्लुताम् ।
नीलोत्पलरसेनैव कुलत्थस्वरसेन च ॥ १०२ ॥
निहन्ति विविध कासं दोषत्रयसमुद्भवम् ।
सरक्तमथ नीरक्तं ज्वरं श्वाससमन्वितम् ॥ १०३ ॥
भ्रमतृड्दाहशूलघ्नं रुच्यं वह्निप्रदीपनम् ।
बलवर्णकरं वृष्यं जीर्णज्वरविनाशनम् ॥
इदं चन्द्रामृतं लौहं चन्द्रनाथेन निर्मितम् ॥ १०४ ॥
त्रिकुटा, त्रिफला, धनियाँ, चव्य, जीरा, सैंधानमक ये प्रत्येक समान भाग एवं मैनसिलद्वारा भस्म किया हुआ लोहचूर्ण पूर्वोक्त ओषधियोंकी बराबर लेकर एकत्र जलके साथ खरल करके नौ नौ रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । फिर प्रतिदिन प्रातःकाल पवित्र होकर अमृतेश्वरी देवीको स्मरण करके एक एक गोली लाल कमल, वा नीले कमलके रस अथवा कुलथीके क्वाथके साथ सेवन करनेसे यह लौह कफ वात और पित्त इन तीनों दोषोंसे उत्पन्न हुई खाँसी एवं अन्यान्य प्रकारकी खाँसी, रुधिरसहित वा रुधिररहित खाँसी, श्वासयुक्त ज्वर, भ्रम, तृषा, दाह, शूलादि रोग और जीर्ण-ज्वरको नष्ट करता है । एवं अत्यन्त रुचिकर बल, वर्ण, वीर्य और अग्निको बढाने-वाला है। इस चन्द्रामृतनामक लौहको चन्द्रनाथने निर्माण किया है ॥ १००-१०४ ॥
भागोत्तरगुटिका ।
रसभागो भवेदेको गन्धको द्विगुणो भवेत् ।
त्रिभागा पिप्पली पथ्या चतुर्भागा विभीतकः ॥ १०५ ॥
पञ्चभागस्तथा वासा षड्गुणा सप्तभागिका ।
भार्ङ्गी सर्वमिदं चूर्णं भाव्यं बब्बोलजैर्द्रवैः ॥ १०६ ॥
एकविंशतिवारास्तु मधुना गुटिका कृता ।