भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५२५


क्षयं कासं तथा श्वासं ज्वरं हन्ति न संशयः । हलीमकं पाण्डुरोगं शोथं शूलं प्रमेहकम् ॥ १३ ॥ अर्शोनाशं करोत्येष बलवृद्धिं च कारयेत् । कामदेवसमं वर्णं तृष्णारोचननाशनम् ॥ १४ ॥ वर्ज्यं शाकाम्लमादौ च भृष्टद्रव्यं हुताशनम् । रसो लक्ष्मीविलासोऽयं महादेवेन भाषितः ॥ १५ ॥

इसकी एक एक गोली शीतल जलके साथ सेवन करनेसे सर्वप्रकारकी खाँसी नष्ट होती है । यह रस क्षय, खाँसी, श्वास, ज्वर, हलीमक, पाण्डु, शोथ, शूल प्रमेह और अर्श रोगको नाश करता है । एवं बलकी वृद्धि कामदेवकी समान सुन्दर कान्ति उत्पन्न करता है, तृषा और अरुचिको दूर करता है । इसपर दूध, स्निग्ध भोजन और पौष्टिक पदार्थ हितकर हैं और शाक, अम्लरसयुक्त पदार्थ, भुनाहुआ अन्न, अग्नि सेवन आदि त्याज्य हैं । इन लक्ष्मीविलासरसको श्रीमहादेवजीने वर्णन किया है ॥ ११३-११५ ॥

शृङ्गाराम्र ।

शुद्धं कृष्णाभ्रचूर्णं द्विपलपरिमितं शाणमानं यदन्यत् कर्पूरं जातिकोशं सजलमिभकणा तेजपत्रं लवङ्गम् । मांसी तालीसचोचे गजकुसुमगदं धातकी चेति तुल्यं पथ्याधात्रीविभीतं त्रिकटुरथ पृथक् त्वर्द्धशाणं द्विशाणम् १६ एलाजातीफलाख्यं क्षितितलविधिना शुद्धगंधाश्मकोलं कोलार्द्धं पारदस्य प्रतिपदविहितं पिष्टमेकत्र मिश्रम् । पानीयेनैव कार्याः परिणतचणकस्विन्नतुल्याश्च वट्यः प्रातः खाद्याश्चतस्रस्तदनु च भजतां शृङ्गवेरं सपर्णम् ॥ १७ ॥

शुद्ध कृष्ण अभ्रककी भस्म ८ तोले, एवं कपूर, जावित्री, नेत्रवाला, गजपीपल, तेजपात, लौंग, जटामांसी, तालीसपत्र, तज, नागकेशर, कूठ और धायके फूल ये प्रत्येक चार चार मासे, हरड, आमले, बहेडा, सोंठ, मिरच, पीपल ये दो दो मासे, छोटी इलायची, जायफल प्रत्येक एक एक तोला, शुद्ध आमलासार गन्धक १ तोला और शुद्ध पारा ६ मासे लेवे । सबको एकत्र चूर्ण करके और जलके साथ खरल करके सीजेहुए चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इसकी प्रतिदिन प्रातःकाल चार