भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २५

आरग्वधादि ।

आरग्वधग्रन्थिकमुस्ततिक्ताहरीतकीभिः कथितः कषायः ।
सामे सशूले कफवातपित्ते ज्वरे हितो दीपनपाचनश्च ॥ ३१ ॥
अमलतास, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी और हरड इनका यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ-आमदोष शूल और सर्वाङ्ग-पीडासे युक्त त्रिदोषज ज्वरमें पान करना चाहिये। यह अग्निप्रदीपक और पाचक है ॥ ३१ ॥

पथ्यादि ।

पथ्यारग्वधतिक्तात्रिवृदामलकैः शृतं तोयम् ।
पाचनसारकमुक्तं मुनिभिर्जीर्णज्वरे सामे ॥ ३२ ॥
हरड, अमलतास, कुटकी, निसोध और आमले इनका बनाया हुआ क्वाथ आम-युक्त जीर्णज्वरमें पाचक और सारक कहागया है ॥ ३२ ॥

मुस्तपर्पटादि ।

पक्त्वा ज्वरे कषायं वा मुस्तपर्पटकं पिबेत् ।
सनागरं पर्पटकं पिबेद्वा सञ्चरालभम् ॥ ३३ ॥
नागरमोथा, पित्तपापडा अथवा सोंठ, पित्तपापडा अथवा धमासा और पित्तपापडा इन तीनोंमेंसे किसी एक क्वाथको बनाकर पीनेसे ज्वर नष्ट होता है ॥ ३३ ॥

नागरादि ।

नागरं देवकाष्ठं च धन्याकं बृहतीद्वयम् ।
देयं पाचनकं पूर्वं ज्वरिताय ज्वरापहम् ॥ ३४ ॥
सोंठ, देवदारु, धनियाँ, बडी कटेरी और छोटी कटेरी इनका क्वाथ सर्वप्रकारके नवीन ज्वरवाले रोगीको पानकरानेसे ज्वर दूर होता है ॥ ३४ ॥

मुस्तादि ।

मुस्तपर्पटकोदीच्यच्छत्राख्याशीरचन्दनैः ।
शृतं शीतं जलं दद्यात्तृड्दाहज्वरशान्तये ॥ ३५ ॥
तृषा, दाह और ज्वरको शान्त करनेके लिये नागरमोथा, पित्तपापडा, सुगन्ध-वाला, धनियाँ, खस और लालचन्दन इनका क्वाथ बनाकर शीतल करके रोगीको पान करावे ॥ ३५ ॥