भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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५४८भैषज्यरत्नावली।[ हिक्काश्वास-

ततः खाद्यं च कर्षैकमनुपानविधिं शृणु।
काष्ठमार्जारिकाचूर्णं मरिचं तच्चतुर्गुणम् ॥ ७० ॥
एकीकृत्य वटीः कुर्याच्चतुर्माषमिता भिषक्।
तासामेकां चर्वयित्वा पिबेदनु जलं कियत् ॥ ७१ ॥
शृङ्गीगुडघृतं नाम सर्वरोगहरं परम्।
अपि वैद्यशतैस्त्यक्तं श्वासं हन्ति सुदारुणम् ॥ ७२ ॥
कास पञ्चविधं हन्ति विविधोपद्रवान्वितम्।
रक्तपित्तं क्षयं चैव स्वरभङ्गमरोचकम् ॥
विशेषाच्चिरकालोत्थं श्वासं हन्ति सुदुस्तरम् ॥ ७३ ॥

इस औषधिको एक एक कर्षकी मात्रासे निम्नलिखित अनुपानोंके साथ सेवन करावे। काठ बिलाईका चूर्ण १ तोला और मिरचोंका चूर्ण ४ तोले दोनोंको एकत्र जलके साथ खरल करके चार चार माषेकी गोलियाँ बनालेवे। प्रथम पूर्वोक्त औष-धको भक्षण करे, फिर इनमेंसे एक गोली खाकर ऊपरसे थोडासा गरम जल पान करे। यह शृङ्गीगुडघृत सर्व प्रकारके रोगोंको नाश करनेके लिये परमोत्कृष्ट औषध है। जिसको सैकडों वैद्योंने त्यागदिया हो ऐसे दारुण श्वास रोगको एवं पाँचों प्रका-रकी खाँसी वा अनेक प्रकारके उपद्रवोंसे युक्त खाँसी, रक्तपित्त, क्षय, स्वरभंग अरुचि और विशेषकर बहुत पुराने दुस्साध्य श्वास रोगको यह घृत नष्ट करता है ॥७०-७३॥

भार्ङ्गीशर्करा।

भाङ्गर्याः शतार्द्धं वासायाः कण्टकार्याश्च पाचयेत्।
चतुर्गुणं जलं दत्त्वा प्रस्थं च दशमूलकम् ॥ ७४ ॥
जलाढके पचेत्तेन चतुर्थमवशेषयेत्।
वस्त्रपूतं च तत्सर्वं सिताप्रस्थं ततः क्षिपेत् ॥ ७५ ॥
उष्णेऽवतारिते तत्र चूर्णानीमानि दापयेत्।
त्रिकटु त्रिफला मुस्तं तालीशं नागकेशरम् ॥ ७६ ॥
भार्ङ्गी वचा श्वदंष्ट्रा च त्वगेलापत्रजीरकम्।
यमानी चाजमोदा च वांशी कौलत्थजं रजः ॥ ७७ ॥
कट्फलं पौष्करं शृङ्गी कोलमात्रं क्षिपेत्ततः।
शीते क्षौद्रं प्रदातव्यं कुडवार्द्धं शुभे दिने ॥ ७८ ॥

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