भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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अरोचकमें अपथ्य ।
कासोद्गारक्षुधानेत्रवारिवेगविधारणम् ।
अहृद्यान्नमसृङ्मोक्षं क्रोध लोभं भयं शुचम् ॥
दुर्गन्धरूपसेवां च न कुर्यादरुचौ नरः ॥ ३६ ॥
अरुचिरोगमें खाँसी, डकार, भूख, और आँसुओंके वेगको रोकना, अहृद्य पदार्थोंका सेवन, रक्तमोक्षण (रुधिर निकलवाना,) क्रोध, लोभ, शोक, दुर्गन्धित और घृणित वस्तुओंका दर्शन आदि क्रियायें नहीं करनी चाहिये ॥ ३६ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्याम् अरोचक-चिकित्सा ।
छर्दि (वमन)-चिकित्सा ।
आमाशयोत्क्लेशभवा हि सर्वाश्छद्यौ मता लङ्घनमेव
तस्मात् । प्राक् कारयेन्मारुतजां विमुच्य संशोधनं वा
कफपित्तहारि ॥ १ ॥
आमाशयमें उत्क्लेश हानस सब प्रकारकी वमन होती है, इसलिये वमनरोगमें प्रथम लंघन कराने चाहिये । वातज वमनको छोडकर अन्य दोषोंकी अधिकता होनेपर कफपित्तनाशक औषधियोंके द्वारा वमन विरेचन करावे ॥ १ ॥
चन्दनेनाक्षमात्रेण सयोज्यामलकीरसम् ।
पिबेन्माक्षिकसंयुक्तं छर्दिस्तेन निवार्यते ॥ २ ॥
दो तोले आमलोंके रसमें एक तोला सफेद चन्दन घिसकर उत्तम शहद मिलाकर पान करनेसे वमन होना दूर होता है ॥ २ ॥
चन्दनं च मृणालं च बालकं नागरं वृषम् ।
सतण्डुलोदकक्षौद्रः पीतः कल्को वमिं जयेत् ॥ ३ ॥
श्वेतचन्दन, कमलकी नाल, सुगन्धवाला, सोंठ और अडूसा इन औषधियोंके समान भाग चूर्णको चावलोंके जल और शहदके साथ मिलाकर पीनेसे वमन दूर होती है ॥ ३ ॥
क्वाथः पर्पटजः पीतः सक्षौद्रश्छर्दिनाशनः ॥
पित्तपापडेके क्वाथको शहदके साथ पीनेसे छर्दिरोग नष्ट होता है ॥