भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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५७०भैषज्यरत्नावली ।[ छर्दि-

अरोचकमें अपथ्य ।

कासोद्गारक्षुधानेत्रवारिवेगविधारणम् ।
अहृद्यान्नमसृङ्मोक्षं क्रोध लोभं भयं शुचम् ॥
दुर्गन्धरूपसेवां च न कुर्यादरुचौ नरः ॥ ३६ ॥

अरुचिरोगमें खाँसी, डकार, भूख, और आँसुओंके वेगको रोकना, अहृद्य पदार्थोंका सेवन, रक्तमोक्षण (रुधिर निकलवाना,) क्रोध, लोभ, शोक, दुर्गन्धित और घृणित वस्तुओंका दर्शन आदि क्रियायें नहीं करनी चाहिये ॥ ३६ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्याम् अरोचक-चिकित्सा ।


छर्दि (वमन)-चिकित्सा ।

आमाशयोत्क्लेशभवा हि सर्वाश्छद्यौ मता लङ्घनमेव
तस्मात् । प्राक् कारयेन्मारुतजां विमुच्य संशोधनं वा
कफपित्तहारि ॥ १ ॥

आमाशयमें उत्क्लेश हानस सब प्रकारकी वमन होती है, इसलिये वमनरोगमें प्रथम लंघन कराने चाहिये । वातज वमनको छोडकर अन्य दोषोंकी अधिकता होनेपर कफपित्तनाशक औषधियोंके द्वारा वमन विरेचन करावे ॥ १ ॥

चन्दनेनाक्षमात्रेण सयोज्यामलकीरसम् ।
पिबेन्माक्षिकसंयुक्तं छर्दिस्तेन निवार्यते ॥ २ ॥

दो तोले आमलोंके रसमें एक तोला सफेद चन्दन घिसकर उत्तम शहद मिलाकर पान करनेसे वमन होना दूर होता है ॥ २ ॥

चन्दनं च मृणालं च बालकं नागरं वृषम् ।
सतण्डुलोदकक्षौद्रः पीतः कल्को वमिं जयेत् ॥ ३ ॥

श्वेतचन्दन, कमलकी नाल, सुगन्धवाला, सोंठ और अडूसा इन औषधियोंके समान भाग चूर्णको चावलोंके जल और शहदके साथ मिलाकर पीनेसे वमन दूर होती है ॥ ३ ॥

क्वाथः पर्पटजः पीतः सक्षौद्रश्छर्दिनाशनः ॥
पित्तपापडेके क्वाथको शहदके साथ पीनेसे छर्दिरोग नष्ट होता है ॥