भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५९५
आहार और रोगीकी नाभिसे ऊपर तीन जौका अन्तर रखकर दग्ध लाहद्वारा दाह देना ये सब आहार विहारादि क्रियायें वमन रोगमें हितकारी हैं ॥ २३–२८ ॥
छर्दिरोगमें अपथ्य ।
नस्यं वस्तिं स्वेदनं स्नेहपानं रक्तस्रावं दन्तकाष्ठं नवान्नम् ।
बीभत्सेक्षां भीतिमुद्वेगमुष्णं स्निग्धासात्म्याहृद्यवैरोधिकान्नम् ।
शिम्बीबिम्बीकोषातक्यो मधूकं चित्रामेलांसर्षपान्देवदालीम् ।
व्यायामं च च्छत्रिकामंजनं च छर्द्यां सत्यां वर्जयेदप्रमत्तः ३०
नस्य, वस्तिक्रिया, स्वेद देना, घृतादि स्नेहपदार्थोंका पान, रुधिर निकलवाना, दतौन करना, नये अन्नका भोजन, घृणित वस्तुओंको देखना; भय, उद्वेग, एवं गरम, स्निग्ध, असात्म्य, अरुचिकर और विरुद्ध पदार्थोंका भोजन, सेमकी फली, कन्दूरी, लौकी, महुआ, चीता, सरसों, देवदाली, व्यायाम, साँपकी छतरीका शाक और अञ्जन लगाना, ये सब वमन रोगमें अपथ्य हैं ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां छर्दिरोग-चिकित्सा ।
तृषाकी चिकित्सा ।
तृष्णायां पवनोत्थायां सगुडं दधि शस्यते ।
रसाश्च बृंहणाः शीता गुडूच्या रस एव च ॥ १ ॥
वातजनित तृषामें गुड मिला हुआ दही, शीतल और बलकारक रस और गिलोयका रसपान करना चाहिये ॥ १ ॥
पित्तजायां तु तृष्णायां पक्वोदुम्बरजो रसः ।
तत्क्वाथो वा हिमस्तद्वत् सारिवादिगणाम्बु वा ॥ २
पित्तकी पिपासामें पके हुए गूलरके फलोंका रस वा गूलरका क्वाथ पान करावे । अथवा सारिवादिगण ( अनन्तमूल, मुलहठी, श्वेतचन्दन, रक्तचन्दन, पद्माख, महुआ कम्भारी और खस ) की औषधियोंको समान भाग मिश्रित दो तोले लेकर अध-पाव जलमें रात्रिमें भिगोदेवे । फिर दूसरे दिन प्रातःकाल छानकर पान करावे ॥ २ ॥
लाजोदकं मधुयुतं शीतं गुडविमर्दितम् ।
काश्मर्यशर्करायुक्तं पिबेत्तृष्णार्दितो नरः ॥ ३ ॥