भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५७८ | भैषज्यरत्नावली । | [ तृषा-
ओदनं रक्तशालीनां शीतं माक्षिकसंयुक्तम् ।
भोजयेत्तेन शाम्येत च्छर्दिस्तृष्णा चिरोत्थिता ॥ १५ ॥
पुराने लालशालिके चावलोंके शीतल भातको शहद मिलाकर खानेसे बहुत दिनोंकी वमन और तृष्णा दूर होती है १५ ॥
वारि शीतं मधुयुतम आकण्ठाद्वा पिपासितम् ।
पाययेद्वामयेच्चापि तेन तृष्णा प्रशाम्यति ॥ १६ ॥
तृषित रोगीको कण्ठपर्यन्त शहद मिलाहुआ शीतल जल पान कराकर वमन करा देनेसे तृषा शान्त होती है ॥ १६ ॥
मूर्च्छाच्छर्दितृषादाहस्त्रीमद्यभृशकर्शिताः ।
पिबेयुः शीतलं तोयं रक्तपित्ते मदात्यये ॥ १७ ॥
पूर्वामयातुरः सन् दीनस्तृष्णार्दितो जलं याचन् ।
लभते न चेदाश्वेव मरणं प्राप्नोति दीर्घरोगं वा ॥ १८ ॥
मूर्च्छा, वमन, पिपासा, दाह आदि रोग, अत्यन्त स्त्रीप्रसंग और अत्यन्त मद्यपान करनेसे जिनका शरीर अत्यन्त क्षीण होगया हो ऐसे मनुष्योंको एवं रक्तपित्त और मदात्ययरोगमें शीतल जल पान करना चाहिये । यदि उक्त रोगोंसे आक्रान्त और तृषासे अत्यन्त पीडित मनुष्य दीन होकर जलको माँगे तब उसको शीघ्र जल न मिलनेसे उसकी मृत्यु होजाती है अथवा रोगकी वृद्धि होती है ॥ १७ ॥ १८ ॥
तृषितो मोहमायाति मोहात्प्राणान्विमुञ्चति ।
तस्मात्सर्वास्ववस्थासु न क्वचिद्वारि वार्यते ॥ १९ ॥
अन्नेनापि विना जन्तुः प्राणान्धारयते चिरम् ।
तोयाभावे पिपार्त्तः क्षणात्प्राणैर्विमुच्यते ॥ २० ॥
कारण, तृषासे मोह ( मूर्च्छा ) उत्पन्न होता है और उससे मृत्यु होजाती है। इसलिये सभी अवस्थाओंमें तृषातुर रोगीको जल देना चाहिये। मनुष्य अन्नके विना चिरकालतक जीवन धारण कर सकता है, किन्तु जलके विना तृषित व्यक्ति क्षणमात्रमें ही प्राण विसर्जन करदेता है ॥ १९ ॥ २० ॥
अत्यम्बुपानात्प्रभवन्ति रोगा निरम्बुपानाच्च स एव दोषः ।
तस्माद् बुधः प्राणविवर्द्धनार्थे मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि ॥२१॥