भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८२ भैषज्यरत्नावली । [ मूर्च्छारोग -
पिबेद् दुरालभाक्वाथं सघृतं भ्रमशान्तये । त्रिफलायाः प्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा ॥ रसायनानां कौन्तस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ ४ ॥
धमासेके क्वाथमें घृत मिलाकर पान करनेसे भ्रम शान्त होता है अथवा हरड, बहेडा, आमला इनके समान भाग चूर्णको शहदके साथ सेवन करनेसे भ्रम दूर होता है । इस रोगमें उष्ण दुग्ध पीना, दस वर्षके पुराने घृतकी मालिश और रसायन ओषधियोंका सेवन करना हितकारी है ॥ ४ ॥
मधुना हन्त्युपयुक्ता त्रिफला रात्रौ गुडार्द्रकं प्रातः । सप्ताहात्पथ्याशी मदमूर्च्छाकामलोन्मादान् ॥ ५ ॥
हितकर पदार्थोंको भोजन करनेवाला रोगी प्रतिदिन रात्रिमें त्रिफलेके समान भाग चूर्णको शहदके साथ एवं प्रातःकाल गुड और अदरखको भक्षण करे तो इससे एक सप्ताहमेंही मद, मूर्च्छा, कामला और उन्मादरोग दूर होंय ॥ ५ ॥
अञ्जनान्यवपीडाश्च धूमाः प्रधमनानि च । सूचीभिस्तोदनं शस्तं दाहः पीडा नखान्तरे ॥ ६ ॥ लुञ्चनं केशलोम्नां च दन्तैर्दशनमेव च । आत्मगुप्तावघर्षश्च हितस्तस्यावबोधने ॥ ७ ॥
त्रिदोषजनित मूर्च्छारोगमें तीक्ष्ण अञ्जन, लहसुन, अदरख आदिके रस और त्रिकुटेके चूर्णकी नस्य देना, पुराने कागज आदिका धूम ग्रहण करना, प्रधमन, त्रिकुटे आदिकी चूर्ण कागजकी फुंकनीमें रखकर नाकमें फूंकना, नखोंके भीतर सुई चुभोना, शरीरमें लोहेकी गरम शलाका जलाकर दागदेना, शरीरका पीडित करना, बाल और रोमोंको उखाडना, दाँतोंसे काटना और शरीरपर कौंचकी फलीको मर्दन करना आदि उपचारोंसे मूर्च्छित रोगीको चेतनता प्राप्त करानी चाहिये ॥ ६ ॥ ७ ॥
गुडं पिप्पलिमूलस्य चूर्णेनातिचिरं लिहन् । चिरादपि च संनष्टां निद्रामाप्नोत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
पीपलामूलके चूर्णको गुडमें मिलाकर सेवन करनेसे चिरकालकी नष्टहुई निद्रा फिर आजाती है ॥ ८ ॥
इक्षवः पोतकी माषाः सुरा मांसं घृतं पयः । गोधूमगुडमत्स्याश्च निद्रां कुर्वन्ति देहिनाम् ॥ ९ ॥