भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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५८४भैषज्यरत्नावली ।[ मूच्छारोग-

असगन्ध ५० पल, सफेद मुसली २० पल, मंजीठ, हरड, हल्दी, दारुहल्दी मुलहठी, रास्ना, विदारीकन्द, अर्जुनकी छाल, नागरमोथा और निसोत ये प्रत्येक ओषधि दस दस पल एवं अनन्तमूल, उसवा, श्वेतचन्दन, लालचन्दन, वच और चीता ये प्रत्येक आठ आठ पल लेवे। इसको एकत्र कूटकर आठ द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते एक द्रोण जल शेष रहजाय तब उतार कर छानलेवे। फिर शीतल होनेपर उसमें धायके फूल १६ पल, शहद ३०० पल, त्रिकुटा ८ तोले, दारचीनी, इलायची और तेजपात ये प्रत्येक १६ तोले, फूलप्रियंगु १६ तोले और नागकेशर ८ तोले इन सबको बारीक चूर्ण करके डालदेवे। फिर इसको एक मिट्टीके शुद्ध पात्रमें भरकर और उसका उत्तम प्रकारसे मुँह बन्द करके रखदेवे। एक महीनेके बाद उसको निकालकर वस्त्रमें छानकर प्रतिदिन दो दो तोले परिमाण सेवन करे। यह अश्वगन्धादि अरिष्ट पान करते ही मूर्च्छा, अपस्मार, शोष, भयंकर उन्माद, कृशता, अर्श, अग्निकी मन्दता और अनेक प्रकारके रोगोंको निश्चय दूर करता है ॥ १३-१९ ॥

मूच्छारोगमें पथ्य ।

धूमोऽञ्जनं नावनमस्रमोक्षो दाहश्च सूचीपरितोदनानि ।
रोम्णां कचानामपि कर्षणाणि नखान्तपीडा दशनोप-
दंशः ॥ २० ॥

नासामुखद्वारमरुन्निरोधो विरेचनच्छर्द्दन-
लङ्घनानि । क्रोधो भयं दुःखकरी च शय्या कथा विचित्रा
च मनोहराणि ॥ २१ ॥

छाया नभोऽम्भः शतधौतसर्पि-
र्मृदूनि तिक्तानि च लाजमण्डः । जीर्णा यवालोहितशाल-
यश्च कौम्भं हविर्मुद्गसतीनयूषाः ॥ २२ ॥

धन्वोद्भवा मांस-
रसाश्च रागाः सषाडवा गव्यपयः सिता च । पुराण-
कूष्मांडपटोलमोचहरीतकीदाडिमनालिकेलम् ॥ २३ ॥

मधूकपुष्पाणि च तण्डुलीय उपोदिकाऽन्नानि लघूनि
चापि । प्रकृष्टनीरं सितचन्दनानि कर्पूरनीरं हिम-
वालुका च ॥ २४ ॥

अत्युच्चशब्दोऽद्भुतदर्शनानि गीतानि
वाद्यान्यपि चोत्कटानि । श्रमः स्मृतिश्चिन्तनमात्मबोधो
धैर्यं च मूर्च्छावति पथ्यवर्गः ॥ २५ ॥

धूमपान, अञ्जन लगाना, नस्य देना, रक्तमोक्षण, अग्निसे दाग देना, सूई चुभोना, रोम और बालोंको उखाडना, नखोंके भीतर पीडा पहुँचाना, दाँतोंसे