भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५९० | भैषज्यरत्नावली । | [ दाह - |
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फलिनीलोध्रसेव्याम्बु हेमपत्रं कुटन्नटम् ।
कालीयकरसोपेतं दाहे शस्तं प्रलेपनम् ॥ ४ ॥
फूलप्रियंगु लोध, खस, सुगन्धवाला, नागकेशर, तेजपात और नागरमोथा इन सबको समान भाग लेकर कलम्बक (कालाचन्दन) के रसमें पीसकर दाहरोगमें लेप करना चाहिये ॥ ४ ॥
ह्रीबेरपद्मकोशीरचन्दनक्षोदवारिणा ।
सम्पूर्णामवगाहेत द्रोणीं दाहार्दितो नरः ॥ ५ ॥
सुगन्धवाला, पद्माख, खस और लालचन्दन इनके समान भाग चूर्णको शीतल जलम मिलाकर उस जलको एक बाल्टीमें भरकर दाहरोगी उसमें शिरडुबाकर स्नानकरे॥५॥
चन्दनादि काथ ।
पटीरपर्पटोशीरमीरनीरदनीरजैः ।
मृणालमिसिधान्याकपद्मकामलकैः कृतः ॥ ६ ॥
अर्द्धशिष्टः शृतः शीतः पीतः क्षौद्रसमन्वितः ।
काथो व्यपहरेद्दाहं नृणां च परमोल्बणम् ॥ ७ ॥
लालचन्दन, पित्तपापडा, खस, सुगन्धवाला, नागरमोथा, कमल, कमलकी नाल, सौंफ, धनियां, पद्माख और आमले इनका अर्द्धावशिष्ट शीतल काथ तैयार करके शहद मिलाकर पीनेसेही मनुष्योंका अतिप्रबल दाह दूर होय ॥ ६ ॥ ७ ॥
पर्पटादिक्वाथ ।
पर्पटः सघनोशीरः कथितः शर्करान्वितः ।
शीतपानं निहन्त्याशु दाहं पित्तज्वरं नृणाम् ॥ ८ ॥
पित्तपापडा, नागरमोथा और खस इनके क्वाथको शीतल करके मिश्री मिलाकर पान करनेसे दाह और पित्तज्वर शीघ्र शान्त होता है ॥ ८ ॥
दाहान्तकरस ।
सूतात्पञ्चार्कत्तश्चैकं कृत्वा पिण्डं सुशोभनम् ।
जम्बीरस्वरसैर्मर्द्यं सूततुल्यं च गन्धकम् ॥ ९ ॥
नागवल्लीदलैः पिष्ट्वा ताम्रपत्रीं प्रलेपयेत् ।
प्रपुटेद्भूधरे यन्त्रे यावद्रसमत्वमाप्नुयात् ॥ १० ॥
द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैरूषणेन च योजयेत् ।
निहन्ति दाहसन्तापं मूर्च्छां पित्तसमुद्भवाम् ॥ ११ ॥