भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५९३


दाहरोगमें अपथ्य ।

विरुद्धान्यन्नपानानि क्रोधं वेगविधारणम् ।
गजाश्वयानमध्वानं क्षारं पित्तकराणि च ॥ २४ ॥
व्यायाममातपं तक्रं ताम्बूलं मधु रामठम् ।
व्यवायं कटुतीक्ष्णोष्णं दाहवान् परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥

विरुद्ध अन्न पान, क्रोध, मल मूत्रादिके वेगोंको रोकना, हाथी और घोडेकी सवारी करना, मार्ग चलना, खारी और पित्तकारक द्रव्योंका सेवन, व्यायाम, धूपका सेवन, मट्ठा, ताम्बूल (पान), शहद, हींग, स्त्रीप्रसङ्ग, चरपरे, तीखे और गरम पदार्थ इन सबको दाहरोगी त्यागदेवे ॥ २४-२५ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां दाहरोग-चिकित्सा ।


उन्मादरोगकी चिकित्सा ।

उन्मादे वातिके पूर्वं स्नेहपानं विरेचनम् ।
पित्तजे कफजे वान्तिः पयोवस्त्यादिकः क्रमः ॥ १ ॥

वातज उन्मादरोगमें पहले तैल और घृतादि स्नेहपदार्थोंका पान, पित्तके उन्मादमें विरेचन और कफजनित उन्मादमें प्रथम वमन फिर दूधकी पिचकारी लगानी चाहिये ॥ १ ॥

यच्चोपदेक्ष्यते किञ्चिदपस्मारचिकित्सिते ।
उन्मादे तच्च कर्त्तव्यं सामान्याद्दोषदूष्ययोः ॥ २ ॥

उन्माद और अपस्मार इन दोनों रोगोंके दोष और दूष्यकी समानता होनेके कारण, अपस्माररोगविधिके अनुसार उन्मादरोगकी चिकित्सा की जासकती है ॥ २ ॥

ब्राह्मी कूष्माण्डफलषड्ग्रन्थाशङ्खपुष्पिकास्वरसाः ।
दृष्टा उन्मादहृतः पृथगेते कुष्ठमधुमिलिताः ॥ ३ ॥

ब्राह्मी, पेठा, वच और शंखपुष्पी इन सबका स्वरस इनमें किसी एक स्वरसको लेकर कूठके चूर्ण और शहदमें मिलाकर पृथक् पृथक् सेवन करनेसे उन्मादरोग नष्ट होता है ३ ॥

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