भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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सारस्वतमिदं चूर्ण ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ।
हिताय सर्वलोकानां दुर्मेधसां विचेतसाम् ॥ १९ ॥
एतस्याभ्यासतः पुंसां बुद्धिर्मेधा धृतिः स्मृतिः ।
सम्पत्तिः कविताशक्तिः प्रवर्द्धेतोत्तरोत्तरम् ॥ २० ॥
इस सारस्वतचूर्णको पूर्वकालमें सम्पूर्ण लोकोंके दुर्बुद्धि और विकृतचित्तवाले मनुष्योंके हितके लिये ब्रह्माजीने निर्माण किया था । इसको सेवन करनेसे मनुष्योंकी बुद्धि, मेधा, धैर्य, स्मरणशक्ति, सम्पत्ति और कवित्वशक्तिकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ॥ १९ ॥ २० ॥
उन्मादपर्पटीरस ।
कृष्णधुस्तूरजैर्बीजैः पञ्चभिः पर्पटीरसः ।
संप्रयोज्यः प्रशान्त्यर्थमुन्मादं भूतसम्भवम् ॥ २१ ॥
काले धतूरेके ५ बीजोंको लेकर पित्तपापड़ेके रसमें उत्तम प्रकारसे खरल करक भूतोन्मादको शमन करनेके लिये सेवन करे ॥ २१ ॥
उन्मादभञ्जिनी ।
शुद्धं मनःशिलाचूर्णं सैन्धवं कटुरोहिणी ।
वचा शिरीषबीजं च हिङ्गु च श्वेतसर्षपम् ॥ २२ ॥
रञ्बीजं त्रिकटु मलं पारावतस्य च ।
एतानि समभागानि गोमूत्रैर्वटिकां कुरु ॥ २३ ॥
गिरिमल्लीबीजसमां छायाशुष्कां च कारयेत् ।
प्रातः सन्ध्यानिशाकाले चक्षुषोरञ्जनं हितम् ॥ २४ ॥
मधुरादिरसे चांज्यं रात्रावपि जलेन च ।
वटकैषा समाख्याता नाम्ना चोन्मादभञ्जिनी ॥
चातुर्थकमपस्मारमुन्मादस्य विनाशिनी ॥ २५ ॥
शुद्ध मैनसिल, सैंधानमक, कुटकी, वच, सिरसके बीज, हींग, सफेद सरसो, करञ्जके बीज, त्रिकुटा और कबूतरकी बीठ इन सबको समान भाग लेकर गोमूत्रके साथ खरल करके इन्द्रजौकी बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे। इससे एक एक वटीको प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें शहदके साथ और रात्रिमें जलके साथ घिसकर नेत्रोंमें आँजनेसे उन्मादरोगीको विशेष उपकार होता है । इस