भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 1416 में से

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६०० भैषज्यरत्नावली । [उन्माद-

दूधमें क्रमसे पृथक् पृथक् एक दिनतक खरल करके सन्ध्याके समय गोला बनाकर गजपुटमें बन्द करके पकावे ॥ ३७-३९ ॥

भूतांकुशो रसो नाम नित्यं गुञ्ज द्वयं लिहेत् ।
आर्द्रकस्य रसेनापि भूतोन्मादनिवारणः ॥ ४० ॥
पिप्पल्याऽक्तं पिबेच्चानु दशमूलकषायकम् ।
स्वेदयेत्कटुतुम्ब्‍या च तीक्ष्णं रूक्षं च वर्जयेत् ॥ ४१ ॥
माहिषं च घृतं क्षीरं गुर्वन्नमपि भोजयेत् ।
अभ्यङ्गः कटुतैलेन हितो भूतांकुशे रसे ॥ ४२ ॥

यह भूतांकुशनामक रस प्रतिदिन दो दो रत्तीकी मात्रासे अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे भूतोन्मादरोग निवारण होता है । इसको सेवन करनेके पश्चात् पीपलका चूर्ण मिलाकर दशमूलका क्वाथ पान करे और कडवी तूंबीके द्वारा स्वेद देवे । इसपर तीखे और रूखे पदार्थ त्याग देने चाहिये । भैंसका घी, भैंसका दूध और गुरु (पचनेमें भारी) अन्नोंका भोजन करे । इस भूतांकुशरसपर शरीरमें सरसोंके तैलकी मालिश करना हितकर है ॥ ४०-४२ ॥

चतुर्भुजरस ।

मृतसूतस्य भागौ द्वौ भागैकं हेमभस्मकम् ।
शिला कस्तूरिका तालं प्रत्येकं हेमतुल्यकम् ॥ ४३ ॥
सर्वं शिलातले क्षिप्त्वा कन्यया मर्दयेद्दिनम् ।
एरण्डपत्रैरावेष्ट्य धान्यराशौ दिनत्रयम् ॥ ४४ ॥
संस्थाप्य च तदुद्धृत्य सर्वरोगेषु योजयेत् ।
एतद्रसायनश्रेष्ठं-

पारेकी भस्म २ भाग, एवं सुवर्णकी भस्म, शुद्ध मैनासिल, कस्तूरी और हरतालकी भस्म ये प्रत्येक एक एक भाग लेवे । सबको खरलमें डालकर घीगुवारके रसके साथ एक दिनतक घोटे, फिर उसको अण्डके पत्तोंसे लपेटकर धानोंके ढेरमें तीन दिनतक गाड देवे, फिर चौथे दिन निकालकर उसको सर्व प्रकारके रोगोंमें प्रयोग करे । यह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है ॥ ४३ । ४४ ॥-

-त्रिफलामधुमर्दितम् ॥ ४५ ॥
तद्यथाग्निबलं खादेद्वलीपलितनाशनम् ।
आपस्मारे ज्वरे कासे शोषे मन्दानले क्षये ॥ ४६ ॥

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