भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 635

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६०३

विसर्परोगमें एवं उन्माद, गद्गदरोग, नपुंसक और सैकड़ों वन्ध्या स्त्रियोंके लिये हितकर एवं बल, वर्ण और आयुकी वृद्धि करता है । दारिद्र्य, पाप, राक्षसबाधा और सर्व प्रकारकी ग्रहबाधाको निवारण करता है और पुंसवन कर्ममें अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ५७–६० ॥

क्षीरकल्याणकघृत ।

द्विजलं सचतुःक्षीरं क्षीरकल्याणकं त्विदम् ॥ ६१ ॥

इस क्षीरकल्याण घृतको दूने जल और चौगुने दूधके साथ पानीयकल्याणक घृतकी ओषधियोंका कल्क डालकर सिद्ध करे । यह घृतभी पूर्वोक्त घृतकी समान उपयोगी है ॥ ६१ ॥

महाकल्याणकघृत ।

एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ।
रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गृष्टिक्षीरं चतुर्गुणम् ॥ ६२ ॥
वीराद्विमाषकाकोली स्वयंगुप्तर्षभर्द्धिभिः ।
मेदया च रसैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणकं महत् ॥
बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ६३ ॥

शालपर्णी, तगर, हल्दी, दारुहल्दी, उसवा, अनन्तमूल, फूलप्रियंगु, नीलकमल, इलायची, मँजीठ, दन्तीकी जड, अनारके बिज, नागकेशर, तालीसपत्र, बडी कटेरी, मालतीके फूल, वायबिडंग, पृश्निपर्णी, कूट, लालचन्दन और पद्माख इनको समान भाग लेकर चौगुने जलमें पकाकर चतुर्थांशावशिष्ट क्वाथ बनालेवे । फिर उस क्वाथ में एकभाग गौका घी और एकवारंकी ब्याई हुई गौका चौगुना दूध एवं बडी शतावर, मुगवन, मषवन, काकोली, कौंच, ऋषभक, ऋद्धि और मेदा इनका कल्क डालकर घृतको पकावे । इस प्रकार यह महाकल्याणकघृत सिद्ध होता है । यह अत्यन्त बृंहणीय और विशेषकर सन्निपातजन्य रोगको हरता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥

स्वल्पचैतसघृत ।

पञ्चमुल्यावकाशमर्यौ रास्नैरण्डत्रिवृद्बला ।
मूर्वा शतावरी चेति क्वाथैर्द्विपलिकोन्मितैः ॥ ६४ ॥
कल्याणकस्य चाङ्गेन तद् घृतं चैतसं स्मृतम् ।
सर्वचेतोविकाराणां शमनं परमं मतम् ॥ ६५ ॥