भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 644, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें६१२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अपस्मार-
कस्तूरी, हरड, नागकेशर, बहेडा, पारा, गन्धक, जायफल, इलायची और लौंग इन प्रत्येकको एक एक कर्ष लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको जलके साथ खरल कर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । वैद्य इस रसको यथादोषानुसार अनुपानके साथ अत्यन्त प्रबल अपस्मार और मूर्च्छारोगमें प्रयोग करे । यह सर्वप्रकारके वातरोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है । अपस्माररोगपर इस रससे बढकर अन्य कोई श्रेष्ठ औषधि नहीं है । इस वातकुलान्तक रसको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने निर्माण किया है ॥२०-२३॥
कूष्माण्डघृत ।
कूष्माण्डस्वरसे सर्पिरष्टादशगुणे पचेत् ।
यष्ट्याह्वकल्कं तत्पानमपस्मारविनाशनम् ॥ २४ ॥
अठारह गुने पेठेके स्वरसमें १ भाग गोघृत, चौथाई भाग मुलहठीका कल्क डालकर घृतको पकावे । उस घृतको पान करतेही अपस्मार नाश होताहै ॥२४॥
ब्राह्मीघृत ।
ब्राह्मीरसे वचाकुष्ठशङ्खपुष्पीभिरेव च ।
पुराणं मेध्यमुन्मादग्रहापस्मारनुद् घृतम् ॥ २५ ॥
ब्राह्मीके रसमें वच, कुठ और शङ्खपुष्पी इनके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ पुराने घृतको डालकर पकावे । वह घृत मेधाजनक एवं उन्माद, ग्रंहबाँधाँ और अपस्माररोगनाशक है ॥ २५ ॥
स्वल्पपञ्चगव्य घृत ।
गोशकृद्रसदध्यम्लक्षीरमूत्रैः समैर्घृतम् ।
सिद्धं चातुर्थिकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ २६ ॥
गौके गोबरका रस, खट्टा दही, दूध, गोमूत्र और घी इन सबको समान भाग लेकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । इस घृतको सेवन करनेसे चौथिया ज्वर, उन्माद, ग्रहपीडा और अपस्मार नष्ट होजाताहै ॥ २६ ॥
बृहत्पञ्चगव्यघृत ।
द्वे पञ्चमूले त्रिफलां रजन्यौ कुटजत्वचम् ।
सप्तपर्णमपामार्गं नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥ २७ ॥
शम्याकं फल्गुमूलं च पौष्करं सदुरालभम् ।
द्विपलांनि जलद्रोणे पचेत् पादावशेषिते ॥ २८ ॥