भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२५
करनेसे पक्षाघात, मन्यास्तम्भ, कर्णरोग और दुस्साध्य अर्दितरोग सात दिनमेंही अवश्य नाश होता है ॥ ५६ ॥
कल्याणलेह ।
सहरिद्रा वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् ।
अजाजी चाजमोदा च यष्टीमधुकसैन्धवम् ॥ ५७ ॥
एतानि श्लक्ष्णचूर्णानि समभागानि कारयेत् ।
तच्चूर्णं सर्पिषाऽऽलोड्यं प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ५८ ॥
एकविंशतिरात्रेण नरः श्रुतिधरो भवेत् ।
मेघदुन्दुभिनिर्घोषो मत्तकोकिलनिस्वनः ॥
जडगद्गदमूकत्वं लेहः कल्याणको जयेत् ॥ ५९ ॥
हल्दी, वच, कूट, पीपल, सोंठ, कालाजीग, अजमोद, मुलहठी और सैंधानमक इन सबको समान भाग लेकर बारीक पीसकर वस्त्रमें छानलेवे । इस चूर्णको घीमें मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करनेसे मनुष्य इक्कीस दिनमें सुनतेही बातको धारण करता है । मेघ और दुन्दुभीकी समान घोर शब्द करनेवाला और मदोन्मत्त कोयलकी समान कण्ठस्वरवाला होता है । यह कल्याण लेह जिह्वाकी जडता गद्गद्-पन और मूकताको दूर करता है ॥ ५७–५९ ॥
शाल्वणस्वेद ।
काकोल्यादिः सवातघ्नः सर्वाम्लद्रव्यसंयुतः ।
सानूपमांसः सुस्विन्नः सर्वस्नेहसमन्वितः ॥ ६० ॥
सुखोष्णः स्पष्टलवणः शाल्वणः परिकीर्त्तितः ।
तेनोपनाहं कुर्वीत सर्वदा वातरोगिणाम् ॥ ६१ ॥
काकोल्यादिगणकी समस्त ओषधि, भद्रदार्वादिगणकी सब ओषधि, सर्व प्रकार के अम्लपदार्थ, सर्व प्रकारके स्नेह ( तैल, घृत, चर्बी, मज्जा ) द्रव्य और सर्व प्रकारके अनूपदेशके जीवोंका मांस इन सबको एकत्र उत्तम प्रकारसे पकावे फिर उसमें नमक डालकर उससे सुहाता २ स्वेद देनेको शाल्वणस्वेद कहते हैं । इसके द्वारा वातरोगियोंको सदा उपनाह स्वेद देना ॥ ६० ॥ ६१ ॥
वातघ्नो भद्रदार्वादिः काकोल्यादिस्तु सौश्रुतः ।
मांसेनात्रौषधं तुल्यं यावताऽम्लेन चाम्लता ॥ ६२ ॥
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