भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६२७

दारुण सन्निपात, क्रोष्टुशीर्षक, अवबाहुक, मन्यास्तम्भ और हनुस्तम्भ इन समस्त वातरोगोंको सात दिनमें ही नाश कर देता है। पक्षाघात आदि व्याधियोंमें यह अत्युत्तम कहागया है ॥ ६६-६९ ॥

बृहद्वातगजांकुश ।

सूताभ्रतीक्ष्णकान्तानि ताम्रतालकगन्धकम् ।
स्वर्णं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलं चाभया विषम्॥७०॥
पथ्या शृङ्गी पिप्पली च मरिचं टङ्कणं तथा ।
तुल्यं खल्ले दिनं मर्द्यं मुण्डीनिर्गुण्डिकाद्रवैः ॥ ७१ ॥
द्विगुञ्जां वटिकां खादेत्सर्ववातप्रशान्तये ।
साध्यासाध्यं निहन्त्याशु बृहद्वातगजाङ्कुशः ॥ ७२ ॥

शुद्ध पारा, अभ्रक, कान्तलोह, ताँबा, हरताल इनकी भस्म, शुद्ध गन्धक, सुवर्णभस्म, सोंठ, खिरेंटी, धनियाँ, कायफल, शुद्ध मीठा तेलिया काकडासिङ्गी, पीपल, मिरच और सुहागा ये प्रत्येक एक एक भाग और हरड दो भाग लेकर सबको एकत्र मुण्डी और निर्गुण्डीके रसमें एक एक दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको सर्वप्रकारके वातरोगोंको शान्त करनेके लिये सेवन करे । बृहद्वातगजांकुशरस साध्य और असाध्य सम्पूर्ण वातविकारोंको शीघ्र नष्ट करताहै ॥ ७०-७२ ॥

महावातगजांकुश ।

मृताभ्रतीक्ष्णताम्रं च सूततालकगन्धकम् ।
भाङ्गीं शुण्ठी बला धान्यं कट्फलं चाभया विषम् ॥७३॥
संपिष्य चपलाद्रावैर्निष्कैकां भक्षयेद्वटीम् ।
वातश्लेष्महरो ह्येष गुरुवातगजाङ्कुशः ॥ ७४ ॥

अभ्रकभस्म, लोहभस्म, ताम्रभस्म, शुद्ध पारा, हरताल, शुद्ध गन्धक, भारङ्गी, सोंठ, खिरेंटी, धनियाँ, कायफल, हरड और शुद्ध मीठा तेलिया इन सबको समान भाग लेवे । फिर एकत्र पीसकर पीपलके क्वाथमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करे । यह महावातगजांकुश रस वात और कफसे उत्पन्न हुये सब रोगोंको दूर करता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥

लघुआनन्दरस ।

पारदं गन्धकं लौहमभ्रकं विषमेव च ।
समांशं मरिचस्याष्टौ टङ्कणं तु चतुर्गुणम् ॥ ७५ ॥