भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६४३

एकएक द्रोण (३२ सेर) जलमें पकावे । जब पकते-पकते चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी एक प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ एवं जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, ऋद्धि, वृद्धि, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, माषवन, जीवन्ती और मुलहठी इन सबका कल्क घीसे चौथाई भाग डालकर घृतको पकाना चाहिये ॥ ६८ ॥ ६९ ॥

छागलाद्यमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् ।
अद्दिते कर्णशूले च बाधिर्ये मूकमिन्मिने ॥ ७० ॥
जडगद्गदपंगूनां खञ्जे गृध्रसिकुब्जयोः ।
अपतानेऽपतन्त्रे च सर्पिरेतत्प्रशस्यते ॥ ७१ ॥

इस छागलाद्य घृतको सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । यह घृत अर्दितवात, कर्णशूल, बधिरता, मूकता, मिन्मिनापन, जडता, गद्गदता, पंगुता, खञ्जवात, गृध्रसी, कुब्डापन, अपतानक और अपतन्त्रक इन समस्त रोगोंमें हितकर है ॥ ७०-७१ ॥

बृहच्छागलाद्यघृत ।

छागमांसतुलां गृह्य दशमुल्याः पलं शतम् ।
अश्वगन्धापलशतं वात्यालकशतं तथा ॥ ७२ ॥
घृताढकं पचेत्तोयैश्चतुर्भागावशेषितैः ।
क्षीरं स्नेहमयं दद्याच्छतावर्या रसं तथा ॥
ताम्रपात्रे दृढे चैव शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ७३ ॥

आरोग्य बकरीका अथवा नपुंसक बकरेका मांस १०० पल, दशमूल १०० पल, असगन्ध १०० पल और खिरेंटी १०० पल लेकर प्रत्येकको एक एक द्रोण परिमाण जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे और सबको एकत्र मिलालेवे । फिर उस क्वाथमें गौका घी, दूध, और शतावरका रस प्रत्येक एकएक आढक ( १२८ पल) डालकर सुदृढ ताँबेके बर्तन में धीरे धीरे मन्दमन्द अग्निके द्वारा पकावे ॥ ७२ ॥ ७३ ॥

अस्यौषधस्य कल्कस्य प्रत्येकं शुक्तिसम्मितम् ॥ ७४ ॥
जीवन्ती मधुकं द्राक्षा काकोल्यौ नीलमुत्पलम् ।
मुस्तं सचन्दनं रास्ना पर्णिनीद्वयशांरिवे ॥ ७५ ॥