भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 678

६४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-

घृतेनानेन सिध्यन्ति वज्रं मुक्तमिवासुरान् ।
निहन्ति सकलान्रोगान् घृतं परमदुर्लभम् ॥ ९३ ॥

सर्व प्रकारके वातसे उत्पन्न होनेवाले रोग, पित्तसे होनेवाले सर्व प्रकारके रोग, सम्पूर्ण शिरके रोग, जंघा, पसली आदिके रोग, मातृग्रहादिके आक्रमणसे या अन्यान्य दोषोंसे बालकका सूखना, बल और मांसकी क्षीणता और मार्गमें चलनेकी असमर्थता आदि सम्पूर्ण रोग इस घृतके सेवन करनेसे इस प्रकार नष्ट होजाते हैं, जैसे छूटा हुआ वज्र असुरोंको तत्काल नाश करदेता है। यह परमदुर्लभ घृत समस्त रोगोंको हरनेवाला है ॥ ९१–९३ ॥

रसायनं वह्निबलप्रदं च वपुःप्रकर्षं विदधाति रूपम् ।
दन्तावलेन्द्रेण समानतेजा दीर्घायुषं पुत्रशतं करोति ॥ ९४ ॥
स्त्रीणां शतं गच्छति चातिरेकं न याति तृप्तिं सरसः समाङ्गः ।
अपुत्रिणीं पुत्रशतं करोति गतायुषं कामसमं बलिष्ठम् ॥ ९५ ॥
महद् घृतं नाम तु छागलाद्यं विनिर्मितं वातनिषूदनं च ।
शिवं शुभं रोगभयापहं च चकार हारीतमुनिर्विशिष्टः ॥ ९६ ॥

यह घृत रसायन, अग्निप्रदीपक, बलवर्द्धक, शरीरको श्रेष्ठ और सुन्दर करनेवाला, गजेन्द्रकी समान तेजस्वी और चिरायुवाले सौ पुत्रोंको उत्पन्न करनेवाला है। इसको सेवन करनेवाला मनुष्य सौ स्त्रियोंके साथ रमण करे तो भी (सारस पक्षीकी समान) तृप्त नहीं होता तथा समशरीर, अक्षीण वीर्यवाला ही रहता है। वन्ध्यास्त्री भी सैकड़ों पुत्रोंवाली होती है और वृद्ध मनुष्य कामदेवकी समान बलवान् होता है। इस वृद्धच्छागलाद्यनामक घृतको वातके नष्ट करने एवं कल्याण करनेके लिये और रोगोंका भय निवारण करनेके लिये हारीतमुनिने निर्माण किया है ॥ ९४–९६ ॥

हंसाद्यघृत ।

हंसमांसतुलां नीत्वा जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन्प्रस्थं प्रतनसर्पिषः ॥ ९७ ॥
सैन्धवं कुडवार्द्धं च तैलमेरण्डसम्भवम् ।
कुडवं घृततुल्यं च भूलतासम्भवं रसम् ॥ ९८ ॥
प्रक्षिप्य विपचेत्सर्पिः कुशलो मतिमान् भिषक् ।
पक्षाघातादिवातेषु घृतं स्यादमृतोपमम् ॥ ९९ ॥