भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५९

रुजार्त्ता मुक्तामयास्ते बलवर्णयुक्ताः ॥ ८१ ॥ संसेव्य तैलं सहसा भवन्ति वन्ध्या च नारी लभते च पुत्रम् । वीरो- पमं सर्वगुणोपपन्नं सुमेधसं श्रीविनयान्वितं च ॥ ८२ ॥ शाखाश्रिते कोष्ठगते च वाते वृद्धौ विधेयं पवनार्द्दि- तानाम् । जिह्वानिले दन्तगते च शूले उन्मादकौब्ज्य- ज्वरकर्शितानाम् ॥ ८३ ॥ प्राप्नोति लक्ष्मीं प्रमदाप्रियत्वं वपुःप्रकर्षं विजयं च नित्यम् । तैलोपसेवी जरया विमुक्तो जीवेच्चिरं चापि भवेद्युवेव ॥ ८४ ॥ देवासुरे युद्धपरे समीक्ष्य स्नाव्यस्थिभग्नानसुरैः सुरांश्च । नारा- यणेनामरबृंहणार्थं स्वनामतैलं विहितं च तेषाम् ॥ ८५ ॥

उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजानेपर इसमें सुगन्धिके लिये अथवा प्रस्वेद और दुर्गन्धको दूर करनेके लिये कपूर, केशर और कस्तूरी ये प्रत्येक चार चार तोले बारीक पीसकर मिलादेवे । इसको महानारायणतैल कहते हैं । यह तैल वातसे पीडित मनुष्य, एकाङ्गहीन, अर्दितवात और कम्पवातयुक्त मनुष्योंको सर्वप्रकारसे विधिपूर्वक सेवन कराना चाहिये । जो पंगु मनुष्य हैं और जो पीठसे खिवडते हैं एवं बहरे, वीर्यके क्षयसे पीडित, मन्यास्तम्भ, हनुस्तम्भ और जो शिरोरोगसे पीडित मनुष्य हैं वे इस तेलको सेवन करनेसे सम्पूर्ण रोगोंसे तत्काल मुक्त होजाते हैं और बल वर्णयुक्त होते हैं और वन्ध्या स्त्री-वीरपुरुषकी समान, सर्वगुण सम्पन्न, अत्यन्त बुद्धिमान्, लक्ष्मीवान् और विनययुक्त पुत्रको उत्पन्न करती है । यह तैल शाखागत-वात, कोष्ठस्थित वात और वातसे पीडित मनुष्योंके वातवृद्धि होनेपर, जिह्वागत और दन्तगत वातपीडामें एवं सर्वप्रकारके उन्माद, कुब्जता और ज्वरसे कृशदेहवाले मनु-ष्योंको सेवन करानेसे शीघ्र उपकार होता है । इसको सर्वप्रकारके वातरोगोंमें देना चाहिये । इस तैलको नित्य सेवन करनेवाला मनुष्य लक्ष्मी और स्त्रीसे प्रीति विज-यको प्राप्त होता है । एवं वृद्धमनुष्य जरा ( बुढापा ) से मुक्त होकर युवा पुरुषकी समान चिरकालतक जीवित रहता है । पूर्वकालमें देवता और असुरोंके भयंकर संग्राममें असुरोंके प्रहारसे टूटगये हैं स्नायु और हड्डियें जिनकी ऐसे देवताओंको देखकर श्रीविष्णुभगवान्‌ने उनकी रक्षाके लिये अपने नामसे इस तेलको निर्माण किया है ॥ २७९-२८५ ॥