भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 694, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 694
६६२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

क्षतानां क्षीणशुक्राणामत्यन्तक्षयरोगिणाम् ।
हनुमन्याहतानां च दुर्बलानां तथैव च ॥ २ ॥
शोषिणां लम्बजिह्वानां तथा मिन्मिनभाषिणाम् ।
अत्यन्तदाहयुक्तानां क्षीणानां वातरोगिणाम् ॥ ३ ॥
एतत्तैलवरं श्रेष्ठं विष्णुना परिकीर्तितम् ।
हिमसागरमाख्यातं सर्ववातविकारनुत् ॥ ४ ॥
ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः ।
शिरोमध्यगता ये च शाखामाश्रित्य ये स्थिताः ॥
ते सर्वे प्रशमं यान्ति तैलस्यास्य प्रसादतः ॥ ५ ॥

अब इस सिद्ध तेलके प्रभावको सुनो-उच्चस्थान, वात व हाथी, घोडा, ऊंट और मकानपरसे गिरेहुए मनुष्योंके लिये एवं पंगु (लँगडे), पीठसे खिंचडनेवाले, जिनका एक अंग सूख गया हो या जिनके सम्पूर्ण अंग सूख गये हों ऐसे मनुष्य, क्षयरोगी, क्षीणवीर्यवाले, अत्यन्त क्षयरोगी, हनुस्तम्भ और मन्यास्तम्भरोगी, दुर्बलमनुष्य, शोषरोगी, लम्बी जिह्वावाले और मिन्मिनाकर बोलनेवाले रोगी, अत्यन्त दाहयुक्त, क्षीणदेहवाले और वातरोगसे ग्रसित मनुष्योंके लिये यह तैल अत्यन्त श्रेष्ठ है। इस हिमसागरनामक तेलको विष्णुभगवान्ने वर्णन किया है। यह सर्व प्रकारके गतविकारोंको नष्ट करनेवाला है। वातसे उत्पन्नहुए, पित्तसे उत्पन्नहुए, शिरमें होनेवाले और शाखाश्रित जितने रोग हैं वे सब इस तेलके प्रभावसे नाश होते हैं ॥ ३००-५॥

सिद्धार्थकतैल ।

शतावरीस्तु निष्पीड्य रसं प्रस्थद्वयं हरेत् ।
तिलतैलं पचेत्प्रस्थं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ॥ ६ ॥
शतपुष्पा देवदारु मांसी शैलेयकं बला ।
चन्दनं तगरं कुष्ठमेला चांशुमती तथा ॥ ७ ॥
रास्ना तुरगगन्धा च समङ्गा शारिवाद्वयम् ॥ ८ ॥
सिन्धूद्भवं समं दद्याद्विश्वभेषजमेव च ।
एभिस्तैलं पचेद्धीमान् दत्त्वाऽऽर्द्रकरसं समम् ॥ ९ ॥