भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 698
६६६भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

त्वच्यं मांसप्रदं चैव शुक्राग्निवलवर्द्धनम् ।
अण्डवृद्धचन्त्रवृद्धिं वा वातरक्तं च नाशयेत् ॥ ३१ ॥

इस तैलको पक्षाघात, अर्दित, हनुग्रह, श्रवणशक्तिका नाश, त्रिदोषजन्य नेत्ररोग, हस्तकम्प, शिरःकम्प, देहकम्प, शिरःपीडा, कलायखञ्ज, गृध्रसी, अपबाहुक, बहरापन, कर्णनाद, दण्डापतानक, विशेषकर मन्यास्तम्भ और हनुस्तम्भ इन सब रोगोंमें सेवन करना । यह तैल सर्वप्रकारके वातरोग, प्रसूतसम्बन्धी सब रोग, अण्डवृद्धि, अन्त्रवृद्धि और वातरक्तरोगको नाश करता है। एवं त्वचाको हितकारी, वीर्य, अग्नि बलकी वृद्धि करता है ॥ २७-३१ ॥

माषतैल १-२ ।

तैलं संकुचितेऽभ्यङ्गे माषसैन्धवसाधितम् ।
बाहुशीर्षगते नस्यं पानं चोत्तरवस्तिकम् ॥
क्वाथोऽत्र माषनिष्पाद्यः सैन्धवं कल्कमेव च ॥ ३२ ॥

१—उड़द और सैन्धेनमकके द्वारा सिद्ध कियेहुए तैलको वायुके द्वारा शरीरमें संकोच होनेपर और बाहुशीर्षगत वातरोगमें मर्दन, नस्य, पान और उत्तरवस्तिद्वारा प्रयोग करनेसे शीघ्र उपकार होता है । इसमें उड़दोंका क्वाथ और सेंधानमकका कल्क लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

माषात्मगुप्तातिरसो रुबूकरास्नाशताह्वालवणैः सुपिष्टैः ।
चतुर्गुणे माषबलाकषाये तैलं कृतं हन्ति च पक्षवातम् ॥ ३३ ॥

२—उड़द, कौंचके बीज, मूर्वा, अण्डकी जड, रास्ना, सोया और सेंधानमक इन सबके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ उड़द और खिरेंटीके चौगुने क्वाथमें सिद्ध किया हुआ तिलका तैल पक्षवातरोगको नष्ट करता है ॥ ३३ ॥

लघुमाषतैल ।

माषप्रस्थं समावाप्य पचेत्सम्यग्जलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ ३४ ॥
प्रस्थं च तिलतैलस्य कल्कं दत्त्वाऽक्षसम्मितम् ।
जीवनीयानि यान्यष्टौ शतपुष्पां ससैन्धवाम् ॥ ३५ ॥
रास्नाऽऽत्मगुप्ता मधुकं बला व्योषं त्रिकण्टकम् ।
पक्षाघातेऽर्दिते वाते कर्णशूले च दारुणे ॥ ३६ ॥