भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ।
भैषज्यरत्नावली आयुर्वेदीय चिकित्सा ग्रन्थोंमें एक उत्कृष्ट और प्रामाणिक चिकित्सा ग्रन्थ समझा जाता है । वैद्य समाजमें आज कल इसका बड़ा आदर है । कारण इसके रचयिता श्रीगोविन्ददाससेनने इसमें अनेक अनुभूत योगोंका संग्रह बड़ी सुन्दर और सरल रीतिसे किया है । इसमें क्वाथ, चूर्ण, अवलेह, आसव, अरिष्ट आदि वनस्पति प्रयोग और रसधातु आदिके द्वारा सिद्ध किये रसायन प्रयोग, इस प्रकार दोनों प्रकारके योगोंका समावेश होनेके कारण इसके द्वारा सभी श्रेणीके वैद्य उत्तमरीतिसे लाभ उठा सकते हैं । इसका प्रत्येक प्रयोग अत्यन्त गुणकारक और आशुफलप्रद होनेसे यह ग्रन्थ वैद्योंको अल्प समयमें ही अत्यन्त आदरणीय हो गया है। अब तक इसके कलकत्ता, लखनऊ, लाहौर आदिमें कई संस्करण हो चुके हैं । पर हमने इसको और भी अधिक उपयोगी बनानेके लिये इसमें दूसरे कई प्राचीन और नवीन ग्रन्थोंके अनेक उत्तम योगोंका संग्रह कर इसको अधिक परिवर्द्धित कर दिया है किन्तु इसमें अन्य ग्रन्थोंके प्रयोगोंके संकलनसे पूज्यपाद वैद्य श्रीगोविन्ददाससेनजीकी धवल कीर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं होगी। बल्कि इससे उनकी उज्ज्वल कीर्ति और भी प्रसारित होगी, ऐसी आशा है । महामान्य कविराज श्रीगोविन्ददाससेनने इसग्रन्थकी अबसे कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले रचना की थी । सेन उपाधिसे जान पड़ता है कि वे बंगदेश निवासी थे । पर किस स्थानमें उनका जन्म हुआ था, इसका कुछ ठीक पता नहीं लग सका । पहले इस ग्रन्थका बङ्गालमें अधिक प्रचार हुआ। फिर धीरे धीरे सारे भारतवर्षमें इसका समादर होने लगा । केवल हिन्दी भाषा जाननेवाले वैद्योंके लिये हमने इसके प्रत्येक श्लोकका सरल हिन्दी अनुवाद किया है। हमें इस ग्रन्थके अनुवाद तथा सम्पादन और परिवर्द्धन करनेमें चरक, अष्टांगहृदय, भावप्रकाश, वङ्गसेन, शार्ङ्गधर, चक्रदत्त, योगरत्नाकर आदि कितने ही ग्रन्थोंके सिवाय कविराज श्रीहरलाल गुप्त कविभूषराकी भैषज्यरत्नावलीसे अधिक सहायता मिली है, इसलिये हम उनके प्रति अत्यन्त कृतज्ञता प्रगट करते हैं । तथा कविराज विनोदलालसेनके ग्रन्थद्वारा भी हमें उस कार्यमें थोड़ी बहुत सहायता लेनी पड़ी है, इसलिये हम उनके भी कृतज्ञ हैं, हमने यथा शक्ति इस ग्रन्थको भली प्रकार देख भाल कर पाठकोंके सम्मुख उपस्थित किया है, यदि कोई त्रुटि दृष्टिदोष आदिसे रह गई हो तो कृपया उसको पाठकगण सुधार तथा सूचित कर अनुगृहीत करें। आगामी संस्करणमें वे सब ठीक कर दी जायँगी ।
$$\left. \text{१६-४-३६} \quad \right} \quad \begin{array}{l} \text{भवदीय—} \ \textbf{वैद्य-शङ्करलाल हरिशङ्कर-} \ \qquad \text{आयुर्वेदोद्धारक-कार्यालय, मुरादाबाद.} \end{array}$$