भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता। ६५३
चतुर्द्रोणेन पयसा जीवनीयैः पलोन्मितैः ।
शृङ्गवेरपलात्पंच त्रिंशद्भल्लातकानि च ॥ ७५ ॥
द्वे पले पिपलीमूलाच्चित्रकाच्च पलद्वयम् ।
यवक्षारपले द्वे च सैन्धवस्य पलद्वयम् ॥ ७६ ॥
सौवर्चलपले द्वे च मञ्जिष्ठायाः पलद्वयम् ।
प्रसारणीपले द्वे च मधुकस्य पलद्वयम् ॥
सर्वाण्येतानि संहृत्य शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ७७ ॥
मूल, पत्ते और शाखासहित प्रसारणी १०० पल, दशमूल १०० पल और असगन्ध १०० पल इन तीनोंको अलग अलग कूटकर जब उसमें सार भाग उत्पन्न होजाय तब एक एक द्रोण जलमें डालकर कढ़ाईमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें तिलका तेल ८ सेर, दहीका तोड ८ आढक, काँजी २ आढक, पाकके लिये जल ४ द्रोण, कल्कके लिये जीवनीयगणकी प्रत्येक औषधि एक एक पल, अदरख ५ पल, भिलावे ३० पल, पीपलामूल २ पल, चीता २ पल, जवाखार दो पल, सैंधानमक २ पल, कालानमक २ पल, मंजीठ २ पल, गन्धप्रसारिणी दो पल और मुलहठी २ पल इन सब औषधियोंको कूट पीसकर डालदेवे । फिर मन्दमन्द अग्निद्वारा धीरे धीरे तेलको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ ७२–७७ ॥
एतदभ्यञ्जने श्रेष्ठं वस्तिकर्मनिरूहणे ।
पाने नस्ये च दातव्यं न क्वचित्प्रतिहन्यते ॥ ७८ ॥
अशीतिं वातजाँरोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ।
विंशतिं श्लैष्मिकांश्चैव सर्वानैतान् व्यपोहति ॥ ७९ ॥
गृध्रसीमस्थिभङ्गं च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ।
अपस्मारं तथोन्मादं विभ्रमं मन्दगामिताम् ॥ ३८० ॥
त्वग्गताश्चापि ये वाताः शिरःसन्धिगताश्च ये ।
जानुसन्धिगताश्चैव पादपृष्ठगताश्च ये ॥ ८१ ॥
इस तैलको मालिश करना, वस्तिकर्म, निरूहवस्ति, पान करना, नस्य देना आदि कर्मोंमें प्रयोग करना । इसपर किसी प्रकारका परहेज नहीं करना चाहिये । यह
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