भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 726

६९४ भैषज्यरत्नावली । [ कफरोग-

महाश्लेष्मकालानलरस ।

हिङ्गूलसम्भवं सूतं शिलागन्धकटङ्कणम् ।
ताम्रं वङ्गं तथाऽभ्रं च स्वर्णमाक्षिकतालकम् ॥ १२ ॥
धुस्तूरं सैन्धवं कुष्ठं हिङ्गु पिप्पलि कट्फलम् ।
दन्तीबीजं सोमराजी वनराजफलं त्रिवृत् ॥ १३ ॥
वज्रीक्षीरेण सम्मर्द्य वटिकां कारयेद्भिषक् ।
कलायपरिमाणां तु खादेदेकां यथाबलम् ॥ १४ ॥
सन्निपातं निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ।
मदसिंहो यथाऽरण्ये मृगाणां कुलनाशनः ॥
तथाऽयं सर्वरोगाणां सद्यो नाशकरो महान् ॥ १५ ॥

हिंगुलसे निकालाहुआ पारा, मैनसिल, शुद्ध गन्धक, सुहागा, ताँबा, वंग, अभ्रक, सोनामाखी इन सबकी भस्म, वंशपत्री, हरतालकी भस्म, धतूरा, सेंधानमक, कूठ, हींग, पीपल, कायफल, जमालगोटा, बापची, अमलतासकी फली और निसोत इन सबको एकत्र चूर्ण करके थूहरके दूधके साथ खरल कर मटरकी बराबर गोलियाँ बनालेवै । इनमेंसे प्रतिदिन जठराग्निके बलाबलके अनुसार एकएक गोली भक्षण करनेसे त्रिदोषजन्य विकार इसप्रकार तत्काल नष्ट होते हैं, जैसे वज्र वृक्षकों शीघ्र विनाश करदेता है वनमें जैसे मदोन्मत्त सिंह पशुओंके समूहको नाश करता है वैसेही यह महाश्लेष्मकालानलरस सर्वप्रकारके रोगोंको शीघ्र नष्ट कर देता है ॥ १२–१५ ॥

श्लेष्मशैलेन्द्ररस ( रसेन्द्रगुटिका ) ।

गन्धकं पारदं चाभ्रं त्र्यूषणं जीरकद्वयम् ।
शठी शृङ्गी यमानी च पुष्करं रामठं तथा ॥ १६ ॥
सैन्धवं यावशूकं च टङ्कणं गजपिप्पली ।
जातीकोषाजमोदे च लौहं यासलवङ्गकम् ॥ १७ ॥
धुस्तूरबीजं जैपालं कट्फलं चित्रकं तथा ।
प्रत्येकं कार्षिकं चैषां श्लक्ष्णचूर्ण प्रकल्पयेत् ॥ १८ ॥
पाषाणे विमले पात्रे घृष्टं पाषाणमुद्गरैः ।
बिल्वमूलरसं दत्त्वा चार्कचित्रकदन्तिकाः ॥ १९ ॥

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