भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ४९


सन्निपातज्वरे पूर्वं कुर्यादामकफापहम् ।
पश्चाच्छ्लेष्मणि संक्षीणे शमयेत्पित्तमारुतौ ॥ ६४ ॥
सन्निपातज्वरमें पहले लंघन, वालुकास्वेद, नस्य, निष्ठीवन (कुल्ले कराना), अवलेह और अञ्जन आदि प्रयोग करने चाहिये । एवं सन्निपातज्वरमें प्रथम आम और कफनाशक चिकित्सा करे पश्चात् कफके क्षीण हो जानेपर वातपित्तको शमन करनेवाली चिकित्सा करे ॥ ६३-६४ ॥

लंघन ।
त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा दशरात्रमथापि वा ।
लंघनं सन्निपातेषु कुर्यादारोग्यदर्शनात् ॥ ६५ ॥
दोषाणामेव सा शक्तिर्लंघने या सहिष्णुता ।
नहि दोषक्षये कश्चित्सहते लंघनादिकम् ॥ ६६ ॥
सन्निपातज्वरमें-तीन दिन, पांच दिन, दश दिन अथवा जबतक आरोग्य लाभ न हो तबतक लंघन कराने चाहिये । जबतक दोष बलवान् रहते हैं तभीतक रोगी लंघनोंको सहन करसकता है और दोषोंका क्षय होनेपर कोई भी रोगी लंघनादिकको नहीं सहन कर सकता ॥ ६५-६६ ॥

स्वेद ।
न स्वेदव्यतिरेकेण सन्निपातः प्रशाम्यति ।
तस्मान्मुहुर्मुहुः कार्यं स्वेदनं सन्निपातिनाम् ॥ ६७ ॥
सन्निपाते जलमयो नराणां विग्रहो भवेत् ।
विना वह्नयुपचारेण कस्तं शोषयितुं क्षमः ॥ ६८ ॥
प्रयोगा बहवः सन्ति सविषा निर्विषा अपि ।
वह्यूष्माणं विना प्रायो न वीर्यं दर्शयन्ति ते ॥ ६९ ॥
प्रतिक्रिया विधावेवं यस्य संज्ञा न जायते ।
पादतले ललाटे वा दहेल्लोहशलाकया ॥ २७० ॥
सन्निपातज्वरमें कफकी प्रधानता होनेके कारण विना स्वेदक्रियाके वह शान्त नहीं होता, इसलिये सन्निपातवाले रोगीको बारम्बार स्वेद देना चाहिये. सन्निपातज्वरमें-रोगीका शरीर जलमें डूबा हुआसा प्रतीत होता है, इस कारण स्वेदक्रियाके विना उस जलको और कोई शोषण नहीं कर सकता । यद्यपि सन्निपातज्वरमें सविष और