भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८१४ भैषज्यरत्नावली । [गुल्मरोग-
संपुटं कारयेत्पश्चात् सन्धिलेपं च कारयेत् ।
ततो गजपुटं दत्त्व स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ७९ ॥
द्विगुञ्जां भक्षयेद् गुल्मे शृङ्गवेरानुपानतः ।
सर्वगुल्मं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ८० ॥
शुद्ध गन्धक, हरताल, ताम्रभस्म और तीक्ष्णलोह इनको सम भाग लेकर घीक्वारके रसमें विधिपूर्वक खरल करे । फिर इसको सम्पुटमें रख सन्धिस्थानोंको बन्द करके गजपुटमें पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय तब निकालकर चूर्ण करलेवे । इसको प्रतिदिन दो दो रत्ती प्रमाण अदरकके रसके साथ खाय । जैसे सूर्य अन्धकारको हरताहै वैसेही यह रस सर्वप्रकारके गुल्मोंको अल्पकालमें ही नष्ट करता है ॥ ७८-८० ॥
गुल्मशार्दूलरस ।
रसं गन्धं शुद्धलौहं गुग्गुलुः पिप्पलः पलम् ।
त्रिवृत्ता पिप्पली शुण्ठी शठी धान्यकजीरकम् ॥ ८१ ॥
प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं पलार्द्धं कानकं फलम् ।
सञ्चूर्ण्य वटिका कार्या घृतेन वल्लमानतः ॥
वटीद्वयं भक्षयेच्चार्द्रकोष्णाम्बु पिबेदनु ॥ ८२ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहा, गूगल, पीपलके वृक्षकी छाल, निसोत, पीपल, सोंठ, कचूर, धनियाँ और जीरा ये प्रत्येक एक एक पल तथा जमालगोटे दो तोले लेवे । सबको एकत्र घृतमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोलियाँ प्रस्तुत कर नित्यप्रति दो गोली अदरकके रसके साथ खाय और ऊपरसे गरमजल पीवे ॥
हन्ति प्लीहयकृद्गुल्मकामलोदरशोथकम् ।
वातिकं पैत्तिकं गुल्मं श्लैष्मिकं रौधिरं तथा ॥ ८३ ॥
गहनानन्दनाथोक्तो रसोऽयं गुल्मशार्दूलः ॥ ८४ ॥
इससे प्लीहा, यकृत्, गुल्म, कामला, पेटकी पीडा, सूजन, वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक तथा रक्तजगुल्म नष्ट होते हैं । श्रीमान् गहनानन्दनाथ महाराजने इस गुल्मशार्दूलनामक रसको निर्मित किया है ॥ ८३-८४ ॥
सर्वेश्वररस ।
ताम्रं दशगुणं स्वर्णात्स्वर्णपादं कटुत्रिकम् ।
त्रिकटु त्रिफला तुल्या त्रिफलार्द्धमयोरजः ॥ ८५ ॥